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Monday, December 10, 2012

एक टुकडा धूप का

कुछ भीगे से एहसास
एक टुकडा धूप का
चाहती हूँ मिल जाए
छुए मेरे अंतर्मन को
और जमते सर्द भावों को
गुदगुदा के जगा जाए
गुजरे रात हौले धीरे
वह एहसास जो जीने की चाहत दे जाए
डूबती साँसों के इन लम्हों में
अब तो यह धुंधलका छट    जाए
उदय हो अब तो वह सुबह
जो शून्य से धड़कन बन जाए
बस एक टुकडा नर्म धूप के एहसासों का
एक बार तो ज़िन्दगी में मेरी आए !