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Monday, June 27, 2022

पहली हवाईयात्रा (किस्से घुमक्कड़ी के भाग 4)

 


गर्ल्स गैंग किस्से घुमक्कड़ी के भाग3

(वाइजेग ) विशाखापट्टनम की स्पेशल यात्रा ...


यह मेरे लिए हर मायने में स्पेशल यात्रा थी, एक तो यह मेरी पहली जिंदगी की "हवाई यात्रा "थी, दूसरा बेटी की जॉब करके "नोवाटेल होटल " फाइवस्टार में बिल्कुल समुंद्र के सामने कमरा बुक था। और बहुत ही vip वेलकम रहना घूमना था। उस पर यह जगह बहुत ही सुंदर थी। मुझे वैसे ही समुंद्र बहुत पसंद है। तो इस तरह से चार दिन के ट्रिप की हर बात खास थी। 


   आस पास के सब जगह के साथ हमने वहां के आदिवासी इलाके और "बोराकेव्स "भी देखी। जब हम वहां फरवरी में भी गए थे तो भी उस वक्त भी वहां बहुत तेज गर्मी थी। 


होटल में हम सुबह रेडी होते ,साथ में हमारा लंच और स्नैक्स,पानी अच्छे से पैक कर के दे देते होटल वाली और गाड़ी तो हमेशा रेडी थी हमें घुमाने के लिए। हम भी पूरे उत्साह से इस नई जगह को एक्सप्लोर कर रहे थे। हर जगह की रोचक जानकारी ले रहे थे।वहां के बीच अब तक के देखे गए बीच से बहुत ज्यादा साफ सुथरे और सुंदर थे। 



एक दिन हम होटल के सामने वाले बीच पर बैठे थे ,शाम का समय था बहुत ही सुंदर और बढ़िया नजारा था, तभी एक तेज लहर आई और बिटिया की चप्पल ले गई ।अब होटल वापिस कैसे आए ,फाइव स्टार होटल दरबान ,और सब एंट्री पर ,वो जो हम भागते हुए लिफ्ट तक गए वह बहुत ही फनी था। अब लगता है कि इतने  क्यों कनफ्यूज थे आखिर हम ,अब यदि समुंदर के किनारे हैं तो इस तरह से बातें होना स्वाभाविक ही था। पर शायद दिमाग में फाइव स्टार होटल का होना था कि कैसे अंदर इस तरह से जाएं।


खैर आने से एक दिन पहले हमे बताया गया कि आज हम "रामो जी स्टूडियो "देखने जाएंगे ,यह हैदराबाद जितना बड़ा तो नहीं पर देखने लायक है, मिस करने लायक नहीं है। उस दिन गर्मी बहुत थी और हम दोनो मां बेटी का बिल्कुल ही जाने का मन नहीं था, सोचा कि यहां से निकलते हैं रास्ते में ड्राइवर को कह देंगे आइडिया चेंज हो गया है आप हमें "ऋषिकोंडा बीच "पर उतार देना। पर एक समस्या जो बहुत बड़ी थी वह थी भाषा की ,न वो हिंदी समझ रहे न इंग्लिश ,उन्हें जो होटल मैनेजर ने कहा था वो बस  यस यस बोलते हमारी हर बात पर और हमे वहां फिल्म स्टूडियो की तरफ ले चले। हम दोनो खूब इरिटेट और चिडचिडे से उतरे गेट पर कि यार!  क्या जबरदस्ती है। नहीं जाना हमे फिल्म स्टूडियो देखने। 




लेकिन हम शायद गलती पर थे ,वो फिल्म स्टूडियो हम दोनों ने  इतना एंजॉय किया कि अभी तक भूल नहीं सकती। वो घरों के ,मार्केट के बड़े बड़े सेट ,जेल पुलिस स्टेशन ,बड़े बड़े बाग ,मंदिर ,चर्च के सेट ,बहुत ही अमेजिंग लगे । 


इसी को देख कर मेरे मन में हैदराबाद वाले फिल्म स्टूडियो को देखने की इच्छा हुई थी जो कुछ वक्त बाद मैने देखा भी। पर यह पहला अनुभव किसी फिल्म स्टूडियो को देखने का बहुत ही रोमांचकारी था। यदि ड्राइवर हमारी बात समझ कर हमें न ले जाता तो हम वाकई कुछ मिस कर देते अपने इस ट्रिप का। बाद में वो हमें बीच पर भी ले गया ,अब यह याद नहीं कि वो उसको कहा गया था ,या हम दोनो बार बार बीच बोल रहे थे तो ले गया। पर हमने दोनो जगह खूब एंजॉय की ।और वापसी में उन्हें थैंक्स बोला। कई बार ट्रिप के दौरान वहां के लोगों की बात मान लेनी चाहिए ताकि बाद में अफसोस न रहे कि हम इतनी दूर गए भी और यह देखना मिस कर दिया। इस ट्रिप के साथ बहुत ही मीठी और प्यारी यादें जुड़ी हैं ठीक किसी भी पहले प्रेम सी और यह हमेशा याद रहेगी।

यात्राएं जब तक कोरोना ने दस्तक नहीं दी थी ,खूब घुमक्कड़ी की और हर यात्रा के साथ तो यूं ही खट्टी मीठी यादें जुड़ ही जाती है। इस सीरीज की आखिरी कड़ी में मिलते है जल्द ही ...


Tuesday, June 21, 2022

किस्से घुमक्कड़ी के (भाग 2)

 खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के भाग 1


खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के अगले भाग में है पहली उड़ीसा यात्रा सुसराल के साथ .. तो इस यात्रा को तो यादगार रहना ही है😊



शादी के बाद दो चार बार जहां घूमने गए हम दोनो पति पत्नी ही गए। फिर बच्चे हुए तो आगे बहनों का सुसराल में परिवार भी बढ़ता गया। तो घूमना परिवार के साथ हो गया ।  और पति के साथ कम शुरुआत में पहले कुछ ट्रिप सास ससुर और ननद के साथ हुए। जब पहला ट्रिप इस तरह का बना तो दिल में बहुत घबराहट थी क्योंकि अस्सी दशक की बहू मेरे जैसी सिर्फ हांजी हांजी और सिर्फ जो पूछा उसके जवाब के साथ सिमटी हुई थी तो इस तरह से उनके साथ घूमने जाना बहुत ही अनोखा एहसास दे रहा था। और एक डर भी क्योंकि पति नहीं साथ जा रहे थे। 

मैं मेरी दोनो बेटियां ननद और उसकी बेटी साथ में सासू मां और ससुरजी। मम्मी यानी सास से मेरी बहुत बनती थी तो उनके साथ सहज थी। पापा के साथ थोड़ा डर वाली फीलिंग  और ससुर बहु वाली एक झिझक भी थी।  वह घर में काफी रौब से रहते थे और जो उन्होंने कह दिया बस वही सही बाकी कोई कुछ न बोले। सरकारी नौकरी में अच्छी पोस्ट पर थे। घूमने का उनका खुद का तो काफी रहता था ,पर इस बार घूमने का प्रोग्राम परिवार के साथ बनाया उन्होंने। अब प्रोग्राम चूंकि उन्होंने ही बनाया था और कहा साथ चलना है तो बस जाना ही था चूंकि मुझमें खुद भी घूमने का कीड़ा था तो अंदर से डरी हुई के साथ खुश भी थी। 

पहला ट्रिप हमारा जगन्नाथ पुरी का था। ट्रेन से जाना था । खाना बना कर ले गए थे । सफ़र बहुत ही सुखद और हंसी खुशी गया। जब हम स्टेशन पर उतरे तो शाम हो चुकी थी । गेस्ट हाउस हमारा बुक था और स्टेशन से कुछ दूर अंदर मन्दिर के कहीं आसपास था।  वहां जा कर पता चला कि  वो सिर्फ रहने की जगह है , खाने पीने का इंतजाम हम लोगों को खुद करना था ।

 ट्रेन का सफर दो दिन का था उन दिनों और हमारे पास तीन छोटे बच्चे थे जिनके कपड़े काफी गंदे हो चुके थे। तो मम्मी और मैं तो मौका मिलते ही कपड़े धोने में लग गए पापा जी खाने का इंतजाम करने चले गए। अभी आधे कपड़े ही धुले थे कि पापा जी आए और बोले कि दूसरे guest House में जाना है यहां आगे भी खाने की  समस्या रहेगी बच्चों के साथ ठीक नहीं रहेगा।  हम सास बहू ने यूं ही आधे धुले  गीले कपड़ों की पोटली बांध ली ,परंतु मैं अंदर से डरी हुई थी कि अब डांट पड़ेगी इस तरह से आते ही कपड़े धोने पर और यूं गठरी बांधने पर ।आखिर उनके भी स्टेट्स की बात थी। उस पर सोने पर सुहागा कि तेज बारिश शुरु हो गई ,लाइट सब गुल हो गई और कोई टैक्सी वहां जहां जाना था वहां तक के लिए नहीं मिल रही थी। उन दिनों कोई मोबाइल या अन्य नेट सुविधा तो थी नहीं कि ऑनलाइन कुछ मंगवा लिया जाए ,बाहर जा कर ढूंढना था और वो भी अनजान शहर में।

 रात होने के कारण गेस्ट हाउस में जो बंदा था वो भी न हमारी भाषा समझ पा रहा न हम उसको कुछ समझा पा रहे। तीन छोटे बच्चे ,ननद और मैं और एक तरह से हर चीज को संभालने वाले पापा जी। खुद का सोचूं तो अभी कुछ ऐसी बात हो जाए तो मैं बाहर भी आसानी से हैंडल कर लूंगी पर उस वक्त की मैं जो चौबीस साल की थी बिल्कुल ही भोंदू और डरपोक सी थी पूरी तरह से बड़ों पर डिपेंडेट। तभी गेस्ट हाउस के सामने एक हाथ रिक्शा खड़ा दिखा ,पापा जी ने उस से कोई मोलभाव नहीं किया बस कहा कि इस से दूर ही कुछ गेस्ट हाउस एक और है वहां तक जाना है ,वो ले चलने को तैयार हो गया। सीट पर किसी तरह हम तीन बच्चों के साथ न जाने कैसे बैठे वो तो अब इतना याद नहीं पर पापा जी रिक्शे वाली की सीट पर हमारे गीले कपड़ों की गठरी ले कर जिस तरह बैठे वो आज भी अच्छी तरह से याद है। रिक्शे वाला न जाने कैसे उस भरी बरसात में हमे ले कर जा रहा था वो भी वो ही जाने। हां यह जरूर था मन में मेरे कि वहां सही सलामत पहुंच जाए ,और जो डांट पड़नी है उस से कैसे बचा जाएगा।


 राम राम करके वहां पहुंचे तो कमरे में जा कर पापा जी मुस्करा रहे , मम्मी ने पूछा क्या हुआ तो यही बोले कि "यह पहला दिन याद रहेगा। तुम सास बहू का रेस्ट हाउस पहुंचते ही उसको घर सा बना देना और मेरा यूं उल्टे मुंह रिक्शे पर बैठ कर आना वो भी तुम्हारी गीली गठरी के साथ। यह तो रात है और बारिश है तो जो मुझे किसी ने इस तरह से देखा नहीं "कह कर वह हंस दिए। 

उनके इस तरह कहने से  माहौल एक दम सहज सरल सा हो गया। और जो एक झिझक सी थी वह भी खत्म हो गई । उस यात्रा के साथ उनके साथ की गई आगे की यात्राएं भी सरल हो गई। बाहर निकल कर उनका घर वाला कठोर रूप बिल्कुल बदल जाता था। मम्मी के साथ मैं शुरू से ही सहज कंफर्टेबल थी। बाहर घूमने में पापा जी के साथ भी वही सहजता आ गई । वह हर चीज का ध्यान रखते ,खाने पीने से ले कर बच्चों के साथ आराम से घूमने का। हर छोटी बात पर बच्चों सा खिलखिलाते और हमे भी हंसाते। उनके साथ याद रखने लायक यात्राओं में सोमनाथ मंदिर , द्वारकाधीश , उड़ीसा ,आदि हैं। 


यह यात्राएं हमें इंसान के उस रूप से भी मिलाती है जो घर में अलग ही व्यक्तित्व लिए रहते हैं पर अलग स्थान अलग परिवेश उन्हें उस व्यक्तित्व से बिल्कुल जुदा दिखाता है जो हमारे समाज के नियमों चलते उन्हें घर में बनाए रखना पड़ता है। घर वापस आते ही हम फिर उसी रंग में वापिस आ जाते हैं। तभी तो मुझे घुम्मकड़ होना पसंद है क्योंकि यही यात्राएं आपको खुद से परिचित करवाती है ,दूसरों के मूल स्वभाव से परिचित करवाती हैं। 

एक और यादगार यात्रा के रंग अगले अंक में ..जुड़े रहिए मेरे साथ खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के में ...


हनीमून ट्रिप का मजेदार किस्सा