Friday, November 26, 2010

गुरुत्वाकर्षण

अपने हर झूठ
और अपने अहम् को
कब तक उछालोगे
गेंद की तरह
सपनों के आसमान में
आखिर एक दिन तो आ कर
जमीन पर ही  गिरोगे
क्यों कि
जीवन का सत्य यही है ...................

रंजू
26/11/10 

Wednesday, November 17, 2010

परछाई

रात के घने अंधेरे
कैसे सब फ़र्क
 मिटा जाते हैं
अलग अलग  वजूद
 अलग राह के
मुसाफिर  की परछाई को
एक कर जाते हैं
रोशन होते ही
हर उजाले में
यह छिटक  कर
अलग हो जाते हैं  
:
:
शायद ज़िन्दगी का सच यही है ?????????

Wednesday, November 10, 2010

अन्तर


दिन भर अपनी चमक से
कोने कोने
को गर्माता
यह सूरज अब
धीरे धीरे
अपनी गुफा
की तरफ़ जायेगा
हौले से निकलता चाँद
अपनी फलक से
इस ढलती शाम
पर गहरा जायेगा

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अलग राहें
अलग निगाहें
टुकडो में बंटी ज़िन्दगी
धीरे धीरे
अब प्यार के लम्हों
का अन्तर
समझ में आ रहा है

Thursday, November 04, 2010

अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो

अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो
नजर और दामन बचा कर  चलने की बात करो
भाषा भी है ,शब्द भी है पास कलम के हमारे 
भावों  में डुबो कर सही तस्वीर तुम करो
हर एक के हिस्से में हैं यह महफूज चंद साँसे
हर पल यूँ मर के जीने का रियाज न तुम करो
तलाशो न हर गजल के मायने कोई
लफ़्ज़ों का यूँ सरे आम कत्ल न तुम करो
कायम है हर रिश्ता ,यहाँ पर चंद शर्तों पर
दिल से प्यार का सफ़र अब ख्यालों में तय करो
सीखा है मुद्दतों बाद मेरी आँखों ने सोना
झूठे  ख़्वाबों का रंग न अब इन में भरो