होंठो की चुप्पी में
दफ़न है
बर्फ हुए जज्बात
पथरी हुई आँखों में
ठिठके हुए सूखे हुए
बीते हुए मौसम के साए
वो गीत जो कभी
गुनगुनाये नहीं गए
पर न जाने क्यों
अब वह लावे से
धधकते सब हदें
पार कर देना चाहते हैं
और झर झर बहते
आक्रोश के रूप में बरसना चाहते हैं....
रंजू भाटिया