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Monday, May 18, 2009

मीठी नींद

अभी तक यही अटका है तू ...क्या वह मेज मैं साफ करूँगा ?

चल जल्दी से जा वहाँ । ग्राहक खड़ा है। पहले मेज साफ कर, फ़िर यह बर्तन धोना ।

पिंटू जल्दी से वहाँ से उठा और भागा कपड़ा ले कर मेज साफ करने को।

ठंड के मारे हाथ नही चल रहे थे, उस पर पतली सी एक कमीज़, जिसकी आस्तीन बार- बार नीचे आ कर काम करते वक्त गीली हो गई थी ...पर काम तो करना था न ,नही तो यह जालिम मालिक फ़िर से पैसे काट लेगा ..इसको तो पैसे काटने के बहाने चाहिए।


पिंटू जैसे बच्चों की यह रोज़ की कहानी है। .इसके जैसे कितने बच्चे यूं बाल मजदूरी करते हैं। तडके सूरज उगने से लेकर रात को देर तक ..गलियाँ खाते हुए ..बड़े हो जाते हैं।

पिंटू यही गांव के करीब एक ढाबा था वहाँ काम करता था ...पढने का बेहद शौक था ..पर जिस परिवार में जन्म लिया था वहाँ काम ही पढ़ाई थी। बीमार माँ का इलाज ..शराबी बाप का कहर बचपन को कहीं वक्त से पहले ही अलविदा कह गया था।

यदि पढने की वह सोचे भी तो परिवार का क्या होगा बीमार माँ और छोटी सी बहन जो सिर्फ़ अभी ४ साल की है। .कभी उसने भी अच्छे दिन देखे थे। .तब उसके पापा शराब नही पीते थे ..बस जम के मेहनत करते।

माँ भी तब दो चार घरों में काम कर के कुछ पैसे ले आती थी। .कभी- कभी वह भी अपनी माँ के साथ उन बड़े घरों में चला जाता था। उसकी भोली सी सूरत देख कर कभी- कभी कोई कोठी की मालकिन अपने बच्चो के टूटे- फूटे खिलौने या कुछ पुराने कपड़े दे देती थी। पर उसकी निगाह तब भी रंग- बिरंगी तस्वीरों वाली किताबों पर अटकी रहती थी ...फ़िर न जाने धीरे- धीरे सब बदलने लगा। पापा उसके पी कर माँ पर हाथ उठाने लगे और माँ लगातार बीमार .अभी वह ८ साल भी नही हुआ था कि पापा की शराब के नशे में एक एक्सीडेंट में मौत हो गई और उसके सपनों ने तो पहले ही दम तोड़ना शुरू कर दिया था।

अरे! कहाँ गुम हो गया है .??.कहीं भी खड़ा- खड़ा सो जाता है। .चल इधर मर ...जल्दी से- यह २ नम्बर मेज पर चाय और बिस्किट दे कर आ ..मालिक की आवाज़ सुन कर वह अपनी सोच से बाहर आ गया और जल्दी से उस तरफ़ भागा !

वह भी सुबह का भूखा है- बिस्किट देख कर पिंटू को याद आया। .ज्यूँ सुबह से उठ कर रात के २ बजे तक काम में लगता है, तो फ़िर होश कहाँ रहता है ..और आज तो माँ की दवा भी खत्म है।


सही मूड देख कर आज ही मालिक से पैसे की बात करता हूँ ..सोच कर वह जल्दी- जल्दी हाथ चलाने लगा। आज काम में कोई ढील नही देगा ..मालिक को खुश कर देगा।


शाम को काम कुछ खत्म हुआ तो वह डरता- डरता मालिक के पास गया।

क्या है बे ..क्यों खड़ा है यहाँ?


आज कुछ पैसे मिल जाते मालिक ..

एक भद्दी सी गाली उसके मालिक ने मुहं से निकाली और कहा- नही है अभी कुछ पैसे .भाग यहाँ से- अभी काम कर।


दे दो न --माँ बहुत बीमार है- .उसकी दवा लानी है।


अभी चुप- चाप से काम कर नही तो एक लात दूंगा। समझा कुछ।


वह भीगी आँखे लिए वहाँ से हट गया ,,दिन ही बुरे चल रहे हैं।

बिट्टू भी उसके साथ वहीं ढाबे में काम करता था। उस से कुछ बड़ा था और वह भी उसकी तरह ही यूं हालात का मारा था ..वह तो उस से भी ज्यादा मेहनत करता था ..सुबह उठ कर अखबार बाँटना और कभी- कभी फुरसत मिलने पर कुछ और काम भी दो पैसे के लिए कर लेता था.।

कुछ दिन ५ बजे जाग कर अखबार भी बाँटा था बिट्टू के साथ, पर वह पैसे भी यूं ही देखते- देखते खत्म हो गए ...और सुबह इतनी जल्दी जाग कर फ़िर देर तक काम भी नही हो पाता। मुनिया भी कल कैसे दूध के लिए जिद कर रही थी ...और माँ भी रोती आंखो से जैसे कह रही थी कि यह उमर तेरी इतनी काम करने की नही है। पर क्या करे वह ..लगता है कल फ़िर सुबह जल्दी उठाना ही होगा। यह मालिक तो पैसे नही देगा ....एक लम्बी गहरी साँस ले के वह फ़िर से काम में जुट गया।

रात को जा कर उसने बिट्टू से कहा कि सुबह वह भी उसके साथ फ़िर से अखबार के लिए चलेगा।

सुबह उठा तो जैसे सारा शरीर टूट रहा था ..पर नही आज माँ की दवा नही आई तो माँ कि तबियत और बिगड़ सकती है ..रात भर भी वह अपनी खांसी को दबा के सोने के कोशिश करती रही है ...वह उठा और कुछ देर में में बिट्टू के पास पहुँच गया ..बिट्टू ने जैसे ही उसका हाथ पकड़ा साथ चलने के लिए ..तो कहा अरे ! तुझे तो बहुत तेज बुखार है ..तू कैसे यह करेगा? आज तो ठंड भी बहुत है ..तू रहने दे ..आज। .नही नही-.आज यह काम करना बहुत जरुरी है ..नही तो माँ की दवा नही आ पायेगी ..वो ढाबे के मालिक का क्या भरोसा फ़िर आज पैसे न दे और अभी १ तारीख के आने में बहुत देर हैं ..घर में कुछ खाने को भी नही है .तू चल मैं अभी कुछ देर में ठीक हो जाऊंगा।


सुबह के अखबार बाँट कर कुछ पैसे हाथ में आए ..तो चाय पीने की इच्छा जाग गई ...चलो ढाबे में जा कर देखता हूँ ..क्या पता चाय आज मालिक ही पिला दे और ये पैसे बच जाएं . वह बिट्टू के साथ ढाबे पहुँचा और काम में जुट गया शरीर जवाब दे रहा था ...पर जैसे तैसे उसने काम करना शुरू किया .बिट्टू ने उसकी हालत देख कर कहा भी कि आज यहाँ काम रहने दे, तबियत ठीक नही है तेरी, पर मालिक तो छुट्टी के नाम पर ही बिदक उठता है ..नही- नही मैं काम कर लूँगा, तू चिंता न कर। बिट्टू भी क्या कर सकता था? चाहे उससे कुछ बड़ा था, पर था तो बच्चा ही न ...
अभी एक मेज पर चाय दे रहा था कि जोर से चक्कर आ गया। उस मेज पर बेठे व्यक्ति ने जैसे ही उसको पकड़ा कि न गिरे वह जमीन पर ..तो वह जैसे चौक गया ..अरे इसको तो बहुत तेज बुखार है ..तुम इसके मालिक हो या कसाई? इतनी छोटी सी उमर में इतना काम करवाते हो और यह इतना बीमार है तब भी तरस नही आता तुम्हे इस पर? ...मैं अभी तुम्हारी शिकायत करता हूँ.पुलिस से। .जानते हो आज कल बाल मजदूरी एक अपराध है? ..मैं कई दिन से तुम्हारे ढाबे पर आ रहा हूँ ..देखता हूँ कि तुम इस से बहुत काम लेते हो।

यह सुनकर ढाबे का मालिक डर गया ..उसने पिंटू को झूठे प्यार से देखते हुए कहा - तबियत ठीक नही थी तो नही आना था रे ....
वो मालिक पैसे ..माँ घर में बहुत बीमार है ...दवा लानी थी ...उस ने बहुत मुश्किल से बोला ।..
उसकी साँस अब जैसे उखड़ने लगी थी। ...हाँ -हाँ देता हूँ ..जब तक वह अन्दर से पैसे लाता पिंटू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा ..उसको गिरते देख वह व्यक्ति जो उसके लिए उसके मालिक से लड़ रहा था ..उसके पास भागकर पहुँचा, पर तब तक देर हो चुकी थी।.एक मासूम बचपन और मौत की मीठी सी नींद में सो चुका था और उस से कुछ दूर खड़ा बिट्टू मूक और असहाय नज़रों से सब देख रहा था !!

रंजना (रंजू )भाटिया
पूर्व प्रकाशित कहानी

Friday, May 01, 2009

मम्मी के सपने ..

उफ्फ्फ्फ़ !!!"पापा जी इसको इस वक्त यह राजकुमारी की कहानी मत सुनाओ !! इसके दिमाग में फ़िर यही घूमता रहेगा ,इतनी मुश्किल से अभी इसको परीक्षा के लिए याद करवाया है ..आप यह पेपर लो इस में इसके जी .के कुछ सवाल हैं खेलते खेलते इसको वही रिवीजन करवाओ !! ""पेपर अपने ससुर को दे कर वह सनी को थपथपा के वहाँ से जाने लगी तो सन्नी बोला "मम्मा प्लीज़ सुनाने दो न कहानी ...बस थोडी सी सुन के फ़िर रिवीजन कर लूँगा ..""

हाँ ..हाँ बहू इतना बच्चे के पीछे नही पड़ते ..अभी तो पढ़ कर उठा है .थोडी देर इसके दिमाग को फ्रेश होने दो .फ़िर इसको जी .के भी पढ़ा दूंगा!

"नही नही "पापा जी आप इसको यही करवाए बस ..यह अभी नही समझेगा तो इसका भविष्य बेकार है बिल्कुल .वह सामने वाले राधा जी की बेटी को देखिये उसके हाथ से तो किताब छूटती नही और एक यह है कि कह कह के इसको पढाना पढता है!

मैंने नेट चालू किया है वहाँ से से भी देखूं कोई नई जानकारी मिलती है तो प्रिंट आउट ले लेती हूँ उसके ...यह कह कर वह सन्नी को घूरती हुई वहाँ से चली गई ..!!

और सन्नी बेचारा फ़िर से जी. के प्रश्न सुनाने में लग गया ...अलका के ससुर माथा पकड के बैठ गए और सोचने लगे कि यह बहू भी हद कर देती है ...पूरा घर लगा है सन्नी को पढाने में अभी छठी कक्षा का ही तो छात्र है पर जब देखो "किताब -किताब और पढ़ाई " ...अरे भाई बच्चो का चहुँमुखी विकास होना चाहिए ...पर कौन समझाए इनको ..!!

उधर सन्नी दादा जी को सोच में डूबा देख वहाँ से भाग के खेल में लग गया ..उसका बस चलता तो वह सारा दिन उड़ती चिडिया के संग उड़ता रहता .पर मम्मी से तो कोई भी पंगा नही लेता ..पापा ही है जो कभी कभी मम्मी को कहते हैं कि इतना पीछे मत पढ़ा करो यूं ..यूं भी भला कहीं पढ़ाई होती है ...पर न जी ..मम्मी कब सुनने वाली हैं ..उनके सपने तो आसमान को छूते हैं !!!

सन्नीईईईई !!!!!!!तू फ़िर खेल में लग गया ..हे भगवान! मैं क्या करूँ इस लड़के का ..?? इधर आ ....देख मैंने तेरे सारे नोट बना दिए हैं जी. के कम्पीटिशन की बहुत सी जानकारी आज मुझे नेट से मिल गई है, मैंने सब एक जगह कर दी है ..बस अब तू ध्यान से इसको पढ़ ..."

और उधर सन्नी बेचारा हैरान परेशान उन नोट्स को देख रहा था कि इनको कैसे दिमाग में घुसाए ? यह मम्मी तो मुझे न जाने क्या बनाना चाहती है ...उसको नोट्स एक बहुत भयंकर राक्षस से दिख रहे थे ....जो उसको चारों तरफ़ से घेरे हुए न जाने किसी दूसरी ही दुनिया के नज़र आ रहे थे .पर उसको इनो याद करना ही होगा नहीं तो
आफत आ जायेगी ..और वह उनको रटने की कोशिश में फ़िर से जुट गया !

इधर अलका सोच रही थी कि अभी तक तो उसका बेटा बिल्कुल उसके कहे अनुसार चल रहा है वह ख़ुद पढाती है ,उसका सारा काम नियम से करवाती है . समय से पोष्टिक खाना ,उठाना सब समय से हो रहा है ..अभी यह समय है उसको इसी सांचे में ढालने का ...आज कल तो १००% मार्क्स आने चाहिए हर चीज में .तभी आगे बढ़ा जा सकता है ..और मेरा सन्नी किसी से कम नही रहेगा ...!!इसको मैंने पहले स्कूल लेवल पर फ़िर नेशनल लेवल पर और फ़िर इंटरनेशनल लेवल पर लाना है और वह ख्यालो में ही सन्नी को उन ऊँचाइयों को छूते देख रही थी जहाँ वह देखना चाहती थी !!

परीक्षा के मारे घर भर में जैसे आफत थी ..हर कोई सन्नी को ज्ञान बंटता रहता और वह बेचारा सन्नी सोचता कि यदि वह फर्स्ट नही आया तो न जाने क्या होगा उसका ..और उसकी मम्मी के सपनो का ..यही सोचते सोचते उसकी हालत ख़राब होती जा रही रही थी ..न भूख लग रही थी और सोना तो वह जैसे भूल ही चुका था ,दिमाग की नसे ऐसे की जैसे अभी बाहर आ जायेगी..

परीक्षा में दो दिन थे बस अब ..शाम को पापा आए तो उन्हें रोज़ की तरह सन्नी उछलता कूदता नज़र नही आया ..उसके दादा जी भी कुछ चिंतित से दिखे ..कुछ भांप कर उन्होंने अलका को आवाज़ लगाई कि आज यह शान्ति कैसे हैं और सन्नी कहाँ है ?

"अपने कमरे में है " परसों से उसके पेपर शुरू हैं न ,तो कुछ नर्वस सा है ..अलका बोली

अरे ..नही बहू मुझे तो दोपहर से उसका बदन गर्म लग रहा है ..दादा जी चिंतित हो कर बोले

नही ..नही पापा जी आपको वहम है ..वह बस कुछ नर्वस है ..आप उसको अब बुखार है कह के सिर पर मत चढाओ !!

अरे मुझे देखने दो ..पापा यह कहते हुए सन्नी के कमरे में आ गए ..सन्नी को हाथ लगाया तो वाकई में उसको तेज बुखार था
तुम भी न बच्चे के पीछे हाथ धो के पड़ जाती हो ..कर लेगा पढ़ाई भी ..और जल्दी से डॉ को फ़ोन लगाया ..उधर सन्नी बुखार में बडबड़ा रहा था कि क्या वह फर्स्ट अब आ पायेगा ..विज्ञान कोई ऐसा चमत्कार नही कर सकता क्या ????????

रंजना ( रंजू ) भाटिया ...कहानी लेखन विधा में आज पेश है यह दूसरी पूर्व प्रकाशित लघु कहानी

Monday, April 20, 2009

भला सिपाहिया डोगरिया

6 दिसम्बर की शाम रेडियो पर ख़बर सुनाई जा रही थी कि कट्टर पंथियों ने बाबरी मस्जिद तोड़ दी सारे देश में दंगा फैल गया है, हज़ारों लोग मारे गये हैं, राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी गयी है। सब तरफ़ दुख ओर दर्द की लहर है, सारा माहौल सहमा हुआ सुनसान हो जाता है और एक चुप सी छा जाती है



दूर बार्डर पर लड़ते सैनिक सिपाहियों के शिविर में भी जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब कंधे से कंधा मिला कर देश की रक्षा के लिए मोर्चा संभाले खड़े हैं, यहाँ कोई बाबरी, अयोध्या का झगड़ा नही, सिर्फ़ अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं। बस..सोच में डूबे हैं वो सब भी कि हम सब क्यों और किसके लिए लड़ रहे हैं? आख़िर यहाँ हमने अपने जान को दाँव पर लगा रखा है, वहाँ हमारे परिवार वाले भी एक लड़ाई लड़ रहे हैं। यहाँ सर्दी गर्मी, बरसात, धूप की प्रवाह किए बिना यह युद्ध सबको दिख तो रहा है.. पर देश के अंदर यह कौन सा अघोषित युद्ध लड़ा जा रहा है ,जिसका कोई नियम नही है।

राजेश भी उन्ही सिपाहियों में देश की रक्षा के लिए वहाँ बार्डर पर तैनात देश का सिपाही था। वो जिस बार्डर पर था ,वहाँ बर्फ़ और ठंड से साँस लेना तक मुश्किल था। उसने जब से यह बाबरी अयोध्या की खबर सुन थी उसका दिल कांप रहा था ....उसका घर संसार भी उसी जगह था .....जहाँ से यह सब ख़बरे आ रही थी। वो बहुत देर से अपनी पत्नी और बच्चे से बात करना चाहता था पर फोन लग नही रहा था और कई दिन से कोई ख़त भी नही आया था। दूर बर्फ़ीली पहाड़ी पर बनी यह पोस्ट बहुत सुनसान थी, सिर्फ़ कभी -कभी अचानक होने वाली गोलो की आवाज़ बता देती थी कि यहाँ भी कोई जीवन है ,चाहे वो सिर्फ़ नाम का है। शुरू शुरू में यहाँ की प्राकतिक सुन्दरता दिल को लुभाती है पर फिर वो सुनसान जगह इंसान को पागल करने लगती है ॥
राजेश अपने बेस कैंप के बाहर अपनी ड्यूटी पर था पर आज उसका ध्यान बार बार अपने घर की तरफ़ जा रहा था ... कानो में डोगरी गाने के बोल गूँज रहे थे.... "भला सिपाहिया डोगरिया दुइ दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना बडा मंदा लगदा ..."।इसका अर्थ उस को उसकी पत्नी का संदेश देता लग रहा था कि दो दिन की छुट्टी ले कर मुझसे मिलने आ जाओ ,तुम बिन बहुत उदास सा लगता है सब, पर दिल में उसकी तस्वीर और कोई संदेश आने के इंतज़ार के सिवा वो कर भी क्या सकता था। भावी मिलन की आस लिए वो अपने परिचय पत्र के साथ रखी अपनी पत्नी, बच्चे की फोटो को देख लेता और सोच में डूब जाता।
तभी उसके साथी ने आ कर कहा कि उसके लिए फोन है, लाइन बहुत जल्दी कट हो रही है, इसलिए जल्दी से आ कर सुन ले। वो भागा उसका दिल किसी अनहोनी आशंका से डरा हुआ था और फोन पर जो उसने सुना वो उसके होश उड़ा देने के लिए काफी था ।वो यहाँ देश की अपनी मातरभूमि के लिए सब कुछ भूला कर अपनी ड्यूटी कर रहा था और उधर देश के अंदर उसका सब कुछ एक जनून की भेंट चढ़ चुका था ....उसकी बीबी की इज़्ज़त, जान और उसके बेटे की साँसे यह अंधे धर्म का जनून ले गया था.. आँखो में आँसू के साथ धुंधली होती बीबी की तस्वीर.. मन को मोहती बच्चे की मुस्कान और कानो में गूँजता गीत.. भला सिपाहिया डोगरीया दो दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना मंदा लगदा ...उसको जैसे दूर कही गहरी वादी से आता लग रही था। दिल में एक सन्नाटा सा छा गया था.. गोलियों की रह रह कर आती आवाज़ अभी भी यह बता रही थी कि जीवन अभी बाकी है और यह यूँ ही चलता रहेगा....


यह मेरी कहानी विधा की कोशिश में पहली लघु कहानी थी जो बहुत पहले पब्लिश हो चुकी है .. । जो कुछ भी हमारे आस-पास घटता है वो कहीं दिमाग़ के किसी कोने में संचित होता रहता है। नया ना लगे शायद आपको मेरी इस कहानी में। इस में कई परिवेश आपको शायद जाने पहचाने लगे क्यूँकि मेरी अधिकतर कहानियाँ आस-पास के माहौल से हैं जो रोज़ाना हम देखते हैं, सुनते हैं, वही चरित्र - कहानी के रूप में आपके सामने है ..इस कहानी का शीर्षक "भला सिपाहिया डोगरिया "एक बहुत मशहूर डोगरी गाने की पंक्तियाँ हैं ... काफ़ी वक्त जम्मू आर्मी माहोल में गुजारा है ,यह पंक्तियाँ आज भी दिल दिमाग में गूंजती रहती है ..
रंजना [रंजू ]भाटिया
२० अगस्त २००७