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Monday, June 01, 2015

आखिर कब तक ?

"यह कौन युवतियां है जो मेरी आत्मा को झिन्झोरती विलाप कर रही है ?" मनुष्य कर्म का लेखा झोखा देखते चित्रगुप्त ने अपने साथ खड़े द्वारपाल से पूछा
"यह वह महिलायें हैं महाराज जिनके साथ कुछ मर्दों ने मनुष्य जाति का अपमान करते हुए जानवरों जैसा सलूक किया और फिर वहां के समाज ने अपने तानों से इनकी आत्मा तक को छलनी कर दिया इतना कि यह बेबस हो   कर अपने जीवन का अंत कर  बैठी पर यहाँ भी उनके इस विलाप में वहां का दिया दर्द ब्यान हो रहा है "
"ओह !! क्या कानून व्यवस्था इतनी लचर है वहां की ? कि अपराधियों को दण्ड नहीं और आगे होने वाले इस तरह अपराध के लिए डर नहीं ?यह कैसा समाज ?यह कैसी कानून व्यवस्था ?"
कानून व्यवस्था  है महाराज पर वो एक  लम्बी प्रक्रिया है ,अपराधी अक्सर बच जाते हैं ,और इसकी शिकार महिलाये जीवन भर आत्मा पर घाव लिए जीती है यह अपने जीवन का अंत कर लेती हैं। 

"बहुत दुखद है यह तो द्वारपाल ,क्या इस समस्या का कोई अंत नहीं ?"
महाराज है तो पर धरती पर आने में इसको शायद लागू करने में वक़्त लगे।
"क्या है बताओ तो जरा ?"
महाराज या तो इस अपराध की सज़ा मौत हो या अंग भंग.… पर इसमें भी सच्चे झूठे का शायद भेदभाव रहे. दूसरा हल धरती पर रहने वाली महिलाओं को स्वयं में तलाश करना होगा खुद को इतना सक्षम बनाना होगा कि कोई उनके साथ यह घिनौना कार्य न कर सके और यदि यह दुखद हादसे न  रुक पाये तो समाज के तानो से व्यथित मौत नहीं जीने का स्वाभिमान तरीका अपनाये समाज को यह बताये की वह किस तरह की दुनिया को धरती पर कानून व्यवस्था बना रहा है जहाँ धरती को रहने लायक बनाने वाली स्त्री ही सुरक्षित नहीं।
हाँ यह दूसरा उपाय ही न्याय करेगा ,पर ,क्या ऐसा होगा वाकई ?
"हाँ महाराज शुरुआत हो चुकी है" ,हर नारी का अपमान अब दूसरी नारी को जाग्रत  होने की चिंगारी दे के जा  रहा है ,वक़्त लगेगा पर एक दिन होगा जब इस अपराध का अंत होगा !

Saturday, September 01, 2012

विपरीत

एक सन्नाटा
एक ख़ामोशी
किस कदर
एक दूजे के साथ है
"सन्नाटा" जमे हुए लावे का
"ख़ामोशी "सर्द जमी हुई बर्फ की
दोनों एक दूजे के विपरीत
पर संग संग एक दूजे को
निहारते सहलाते से अडिग है
लावा जो धधक रहा है
जब बहेगा आवेग से
तो जमी बर्फ का अस्तित्व
भी नहीं रह पायेगा
हर हसरत हर कशिश
उस की उगलते
काले धुंए में
तब्दील हो जाएगी
तय है दोनों के अस्तित्व का
नष्ट होना ...फिर भी
साथ साथ है दोनों
ख़ामोशी से एक दूजे को सुनते हुए
एक दूजे के साथ रहने के एहसास
को सहते हुए ...
ठीक एक आदम और हव्वा से
जो सदियों से प्रतीक हैं
इसी जमे लावे के
और सर्द होती जमी बर्फ के !!!!

यह रचना इस चित्र से जुडी हुई है .....जो अपनी सुन्दर छवि से अनेक रचनाएं मुझसे लिखवा गयी ..यह उन में से एक है ...