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Monday, September 23, 2013

किस्सा ऐ प्याज "

कुछ समय पहले एक कविता लिखी थी "बहुत दिन हुए ....

बस ,एक ख़त लिखना है मुझे
उन बीते हुए लम्हों के नाम
उन्हें वापस लाने के लिए
बहुत दिन हुए ..
यूँ दिल ने
पुराने लम्हों को जी के नहीं देखा ....

उसी तर्ज़ पर यह पंक्तियाँ ...."
किस्सा ऐ प्याज "



बहुत दिन हुए
सब्जी दाल को
प्याज के साथ बना के नहीं देखा

"फ़ूड फ़ूड "चेनल पर रेस्पी बताते हुए" शेफ " प्याज पर प्याज काटे जा रहे हैं और एक हम है जो उन आंसुओं को तरस रहे हैं जो प्याज काटने से आँखों से झर झर बहते थे:)

बिन प्याज के दाल है हलकी
सब्जी भी बे-लिबास लगती है
खाली पड़ी वो प्याज की टोकरी
अपने भरने की राह तकती है

टमाटर नासाज है अकेले भुने जाने से
अदरक लहसुन की पेस्ट सुलग के जलती है
न जाने कब महकेगी रसोई प्याज के कटने से
प्याज के छिलकों की उतरती परत "संसद "में दिखती है ## ranju bhatia