Showing posts with label लेख गुलजार कविता. Show all posts
Showing posts with label लेख गुलजार कविता. Show all posts

Sunday, August 18, 2013

उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ ,मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले



शहतूत की डाल पर बैठी मीना
बुनती रेशम के धागे
लम्हा लम्हा खोल रही है
पत्ता पत्ता बीन रही है
एक एक साँस बजा कर सुनती है सोदायन
अपने तन पर लिपटती जाती है
अपने ही धागों की कैदी
रेशम की यह कैदी शायद एक दिन अपन ही धागों में घुट कर मर जायेगी !(गुलजार )
इसको सुन कर मीना जी का दर्द आंखो से छलक उठा उनकी गहरी हँसी ने उनकी हकीकत बयान कर दी  और कहा जानते हो न वह धागे क्या हैं ? उन्हें  प्यार कहते हैं मुझे तो प्यार से प्यार है ..प्यार के एहसास से प्यार है ..प्यार के नाम से प्यार है इतना प्यार कोई अपने तन पर लिपटा सके तो और क्या चाहिए...

मीनाकुमारी ने जीते जी अपनी डायरी के बिखरे पन्ने प्रसिद्ध लेखक गीतकार गुलजार जी को सौंप  दिए थे ।  सिर्फ़ इसी आशा से कि सारी फिल्मी दुनिया में वही एक ऐसा शख्स है ,जिसने मन में प्यार और लेखन के प्रति   आदर भाव थे ।मीना जी को यह पूरा  विश्वास था कि गुलजार  ही सिर्फ़ ऐसे  इन्सान है जो उनके लिखे से बेहद  प्यार करते हैं ...उनके लिखे को समझते हैं सो वही उनकी डायरी के सही हकदार हैं जो उनके जाने के बाद भी उनके लिखे को जिंदा रखेंगे और उनका विश्वास झूठा नही निकला |गुलजार जी ने मीना जी की भावनाओं की पूरी इज्जत की उन्होंने उनकी नज्म ,गजल ,कविता और शेर को एक किताब का रूप दिया |
मीना जी की आदत थी रोज़ हर वक्त जब भी खाली होती डायरी लिखने की ..वह छोटी छोटी सी पाकेट डायरी अपने पर्स में रखती थी ,गुलजार जी ने एक बार पूछा उनसे कि यह हर वक्त क्या लिखती रहती हो,तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं कोई अपनी आत्मकथा तो लिख नही रही हूँ बसकह देती हूँ बाद में सोच के लिखा तो उस में बनावट  आ जायेगी जो जैसा महसूस किया है उसको उसी वक्त लिखना अधिक अच्छा लगता  है  मुझे ...और वही डायरियाँ नज़मे ,गजले वह विरासत में अपनी वसीयत में गुलजार जी  को दे गई जिस में से उनकी  गजले किताब के रूप में आ चुकी हैऔर अभी डायरी आना बाकी है |
गुलजार जी कहते हैं पता नही उसने मुझे ही क्यों चुना इस के लिए वह कहती थी कि  जो सेल्फ एक्सप्रेशन अभिव्यक्ति  हर लिखने  वाला राइटर शायर या कोई कलाकार   तलाश करता है वह तलाश उन्हें  भी थी शायद वह कहती थी कि जो में यह सब एक्टिंग करती हूँ वह ख्याल किसी और का है स्क्रिप्ट किसी और की  और डायरेक्शन  किसी और कहा  कि इस में मेरा अपना जन्म हुआ कुछ भी  नही मेरा जन्म वही है जो इन डायरी में लिखा  हुआ है ...मीना जी का विश्वास गुलजार पर सही था ...आज गुलजार जी के जन्मदिन पर यह लिखा हुआ याद आ गया ...जन्मदिन मुबारक गुलजार जी ...........

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा
अगरचे एहसास कह रहा है
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ.......(.गुलजार )

Monday, December 01, 2008

किसी के लिए महज खेल - तमाशा है यह शायद

पल भर में कैसे ज़िन्दगी बदल जाती है
किसी के एक इशारे से यह खेल खेल जाती है

सुबह निकलते हुए अब एक पल सोचता है मन
देखे हम आते हैं या कोई खबर घर भर को दहला जाती है

मुस्कराते चेहरे डूब जाते हैं आंसुओं में
इन्सान की जान कितनी सस्ती हो जाती है

किसी के लिए महज खेल - तमाशा है यह शायद
पर यहाँ पल भर में किसी की दुनिया बदल जाती है

रंजू

२६ नवम्बर को जो कुछ बीता वह कभी भुलाया नही जा सकता ..लगातार सब देखते देखते जैसे सब शून्य सा नजर आने लगा है अब तक क्या लिखे न कुछ दिमाग में आ रहा है न लिखा जा रहा है ..सब एक ही जैसी हालत से गुजर रहे हैं ..आक्रोश गुस्सा , बेबसी जैसे लफ्ज़ सबके लिखने में ,बोलने में झलक रहा है ...आतंकवादी हमला शायद दिलों में दर्द देने को कम था जो राजनेताओं के बयानों ने और बढ़ा दिया ..उनकी नजरों में यह सब छोटी छोटी बातें हैं जो अक्सर बड़े बड़े शहरों में होती रहती है ...इसी बीच दिल्ली में वोट भी शुरू हुए ..किसी को वोट देने का दिल नही हुआ पर फ़िर लगा कि इस अधिकार का प्रयोग कर के जिन्हें लाना चाहिए उन्हें तो लाये ..पर सच कहूँ तो एक भी ऐसा वोट देने वक्त नजर नही आया .वोट दे दिया पर उसके नतीजे से अधिक अब लगता है कि कुछ ऐसा होना चाहिए जो हालात बदल दे और हर इंसान को सिर्फ़ प्यार की भाषा सिखा दे ...पर इस के लिए सबको एक साथ होना होगा और उसके लिए किसी इस प्रकार की दुखद घटना की जरुरत न पड़े ..कभी गुलजार ने इसी तरह के हालत पर कहा था ...

एक ख्याल था ....इन्कलाब का
इक जज्बा था
सन अठारह सौ सत्तावन !
एक घुटन थी ,दर्द था ,वो अंगारा था जो फूटा था
डेड सौ साल हुए हैं उसकी
चुन चुन कर चिंगारियां हमने रोशन की हैं
कितनी बार और कितनी बीजी है चिंगारियां हमने
और उगाए हैं पौधे उस रोशनी के !
हिंसा और अहिंसा से
कितने सारे जले जलाव
कानपुर, झांसी ,लखनऊ, मेरठ ,रुड़की ,पटना
आजादी की पहली पहल ज़ंग तेवर दिखलाये थे
पहली बार लगा साँझा दर्द है बहता है
हाथ नही मिलते पर कोई उंगली पकड़े रहता है
पहली बार लगा था खून खोले तो रूह भी खौल उठती है
भूरे जिस्म की मिटटी में इस देश की मिटटी बोलती है

पहली बार हुआ था ऐसा ..
गांव गांव
रुखी रोटियाँ बटती थी
ठंडे तंदूर भड़क उठते थे !
चंद उड़ती हुई चिंगारियों से
सूरज का थाल बज उठा था जब ,
वो इन्कलाब का पहला गरज था !
गर्म हवा चलती थी तब
और बिया के घोंसलें जैसी
पेडों पर लाशें झूलती थी
बहुत दिनों तक महरौली में
आग धुएँ में लिपटी रूहें
दिल्ली का रास्ता पूछती थी

उस बार मगर कुछ ऐसा हुआ
क्रांति का अश्व तो निकला था
पर थामने वाला कोई न था
जाबांजों के लश्कर पहुंचें थे
मगर सलाराने वाला कोई न था

कुछ यूँ भी हुआ ............
अब तो सब कुछ अपना है
इस देश की सारी नदियों का अब सारा पानी मेरा है
लेकिन प्यास नही बुझती

न जाने मुझे क्यों लगता है
आकाश मेरा भर जाता है जब
कोई मेघ चुरा के ले जाता है
हर बार उगाता हूँ सूरज
और खेतों को ग्रहण लग जाता है

अब तो वतन आजाद है मेरा
चिंगारियां दो ....चिंगारियां दो ...
मैं फ़िर से बीजूं और उगाऊं धूप के पौधे
रोशनी छि ड़ कूं जा कर अपने लोगों पर
मिल कर आवाज़ लगाएं
इन्कलाब
इन्कलाब
इन्कलाब !