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Sunday, October 09, 2022

डाकिया डाक लाया


 संदेशे तब और अब ......डाकिया डाक लाया


यूँ ही बैठे बैठे

याद आए कुछ बीते पल

और कुछ ....

भूले बिसरे किस्से सुहाने

क्या दिन थे वो भी जब ....

छोटी छोटी बातों के पल

दे जाते थे सुख कई अनजाने


दरवाज़े पर बैठ कर

वो घंटो गपियाना

डाकिये की साईकल की ट्रिन ट्रिन सुन

बैचेन दिल का बेताब हो जाना

इन्तजार करते कितने चेहरों के

रंग पढ़ते ही खत को बदल जाते थे

किसी का जन्म किसी की शादी

तो किसी के आने का संदेशा

वो "काग़ज़ के टुकड़े" दे जाते थे


पढ़ कर खतों की इबारतें

कई सपनों को सजाया जाता जाता था

सुख हो या दुख के पल

सब को सांझा अपनाया जाता था

कभी छिपा कर उसको किताबों में

कभी कोने में लटकती तार की कुण्डी से

अटकाया जाता था


जब भी उदास होता दिल

वो पुराने खत

महका लहका जाते थे

डाकिये को आते ही

सब अपने खत की पुकार लगाते थे


पर अब ....


डाकिया ,बना एक कहानी

रिश्तों पर भी पड़ा ठंडा पानी

अब हर सुख दुख का संदेशा

घर पर लगा फोन बता जाता है

रिश्तों में जम गयी बर्फ को

हर पल और सर्द सा कर जाता है

अब ना दिल भागता है

लफ़्ज़ों के सुंदर जहान में

बस "हाय ! हेलो ! की रस्म निभा कर

लगा जाता है अपने काम में ...