
अस्तित्व
अपना ही अस्तित्व
अजनबी सा
नजर आता है
मुझे ...
जब गैरों को तू
मुझे अपना कह कर
मिलाता है.......
आईना
अपना ही चेहरा
बिना आवाज़ के
सामने तो दिख जाता है
पर ....
आईने के पीछे की दुनिया
क्या है.........
यह कौन देख पाता है ?
दिखते अक्स में
धडकता दिल है
पीछे आईने की दीवार को
कौन कब समझ पाता है ....?
रंजना (रंजू ) भाटिया