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Tuesday, December 22, 2009

लफ्ज़ ,कुछ कहे -कुछ अनकहे ("क्षणिकाएँ..")


तेरे मेरे बीच

तेरे मेरे बीच
एक दुआ
एक सदा
मेरी बेखुदी
तेरी बेरूख़ी
चटका हुआ आईना
काँपता पीले पत्ते सा
फिर भी यह रिश्ता
जन्म तक
यूँ ही चलता रहेगा !!

साथ
जब मैं उसके साथ नही होती
तो वह मुझे
हर श्ये में तलाश करता है
पहरों सोचता है मेरे बारे में
और मिलने की आस करता है
पर जब मैं मिलती हूँ उस से
तो वह तब भी कुछ
खोया सा उदास सा
जाने क्यों रहता है !!

इन्द्रधनुष


सात रंगो से सज़ा
कोई नशीला गीत
दिखता हर रंग में
बस एक ही लफ़्ज़
प्रीत

रिश्ता

रूह से रूह का
एक बेनाम सा
पर दिल की अन्तस
गहराई में डूबा
क्या ज़रूरी है
इस को कोई नाम देना

प्यार


क्यों आज हवा
हर साँस लगती है अपनी
हर फूल ख़ुद का
चेहरा-सा लगता है
मन उड़ रहा है
कुछ यूँ ख़ुश हो के
जैसे इच्छाओं ने
पर लगा लिए हैं
और रूह आज़ाद हो के
तितली हो गई है

एक बोल


दुनिया के इस शोर में
बस चुपके कह देना
प्यार का एक बोल
पी लूंगी मैं
बंद आँखों से
जो कहा तेरी आंखों ने !!

मेरा वजूद

तेरे अस्तित्व से लिपटा
यूं घुट सा रहा है
कि एक दिन
तुझे ..
मैं तन्हा
छोड़ जाऊंगी !!



रंजना (रंजू )भाटिया

Tuesday, December 15, 2009

क्षणिकाएँ...


१)उलझन

बनो तुम चाहे
मेरी कविता
चाहे बनो अर्थ
चाहे बनो संवाद,
पर मत बनो
ऐसी उलझन
जिसे में कभी
सुलझा सकूं!
२)तन्हा

चाँद भी तन्हा
तारे भी हैं अकेले
और हम भी उदास से
उनकी राह तकते हैं
तीनो हैं तन्हा एक साथ
फ़िर भी क्यों इस कदर
अकेले से दिखते हैं ?


३)चुपके से

आओ बेठो ,
मेरे पास
और कुछ चुपके
से कह जाओ
पर जगाना
उन उलझनों को
जिनको थपथपा
के मैंने सुलाया है अभी !

४)दर्द


यह दर्द भी अजीब शै है
जिद्दी मेहमान सा..
दिल में बस जाता है
फ़िर चाहे इसको
पुचकारो ,संभालो जितना
यह उतना ही नयनों से
छलक जाता है!

५)समय

यूँ फिसला जैसे
हाथ धोते वक़्त
साबुन बेसिन में ॥


६)स्पर्श

कांपती साँसें
लरजते होंठ
आँखों में है
एक दबी सी ख़ामोशी
क्या वो तुम नहीं थे?
जिसने अभी छुआ था
मुझे संग बहती हवा के !!


७)अस्तित्व

रिश्तों से बंधी
पर कई खंडों में खंडित
""हाय ओ रब्बा!""
कहीं तो मुझे मेरे
अस्तित्व के साथ जीने दे!!


कुछ पुरानी क्षणिकाएँ रंजना (रंजू ) भाटिया