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Saturday, December 29, 2012

सन्नाटा सा है दिल में

सुनो ...
आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ना जाने मेरी कविता के
सब मायने
कहाँ खो  गये हैं
मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों ,
बेमानी  से हो गये हैं
दिखते  हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार,  भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी कत्लगाह से
कम नही दिखते...
हो सके  तो दे देना अब मुझे
विश्वास  और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की पावन  मिटटी  की
खुशबु  थे कभी!!

सन्नाटा सा है दिल में ,और एक अजब सी बैचनी ,जो रह रह कर दिल को और भी मायूस कर रही है ...कोई शब्द नहीं है कहने को ,लिखने को ..बारह दिन तक वह एक मशाल की तरह जली और अब वह खामोश  है पर क्या सच में वह खामोश है ...? चुप सी लगी हुई आँखे टी वी पर आने वाली खबर को देख रही है और दिल कह रहा है कुछ नहीं होगा बस यह शोर है ..फिर से किसी अगले हादसे के लिए तैयार रहे .चाहे जितने बंद कर लो ,चाहे जितनी रेलियाँ निकाल लो ..न अब वह लड़की वापस आएगी जो अपने माँ पिता और भाइयों की आस थी . न वह लड़का जो उसके साथ था उस रात इस  हादसे से कभी उबर पायेगा ...हर होने वाली घटना के पीछे कुछ अच्छा होता है ..इस में क्या अच्छा होगा ..?कौन जाने ? कोई जवाब नहीं है .........है तो मेरे जहन में तो सिर्फ एक सन्नाटा ......जो किसी तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी से कम नहीं .....और सवाल क्या इस तरह से चेतना जागने के लिए ,और कानून नए बनाने के लिए कीमत किसी की जान औरवह भी इतने वीभत्स तरीके से देनी होगी ? तब देश और इसको चलाने वाले जागेंगे ?


यह सोच है हर उस लिखने वाली एक कॉमन महिला की ..जो रोज़ इस तरह के हादसों को सुनती है ,झेलती है और फिर आश्वासन पा कर अगले हादसे के लिए डरती है ,सहमती है और अपनी दिनचर्या में लग जाती है .....