कैसे बांधे...मन से मन की डोर
मैं एक दरिया की लहर ,चली मिलने सागर की ओर
दिल में बसे हैं जाने, कितने सपने सलोने
आंखो की लाली में दिखे ,प्यार की भोर
महके मेरा तन -मन जैसे केसर
जब दिल में जगे ,यादों का छोर
मैं एक दरिया की लहर ,चली मिलने सागर की ओर
खिले हुए हैं अरमानों के पंख सुहानेमनवा बस खींचे तेरी ही ओर
कैसे पार लगाऊं अब यह रास्ता
कठिन बहुत है प्यार का हर मोड़
मैं एक दरिया की लहर , चली मिलने सागर की ओर ....
पीछे बीता सप्ताहांत ऋषिकेश ,गंगा नदी के साथ बीता ..चलती ठंडी हवा और बहती नदी की लहरें ......अदभुत लगता है बीतता हर लम्हा ...और दे जाता है दिल की बहती उथल पुथल में कई विचार ,कई सोच ओर कई नए लफ्ज़ ...उन्ही विचारों से एक विचार ,कुछ इस तरह से कागज पर बिखरे ...
रंजना ( रंजू ) भाटिया ,ऋषिकेश ..२६ अप्रैल २००९