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Thursday, October 20, 2016

कितना संक्षिप्त है प्यार और भूलने का अरसा कितना लंबा

पाब्लो नेरूदा एक कैदी की खुली दुनिया

पाब्लो नेरुदा जब 1971 में नोबेल पुरस्कार लेने के लिए पेरिस स्टाक होम पहुँचे थे, उसी समय हवाई अड्डे पर ढेर सारे पत्रकारों में से किसी ने उनसे पूछा : सबसे सुन्दर शब्द क्या है ?’ इस पर नेरुदा ने कहा ‘‘मैं इसका जवाब रेडियो के गाने की तरह काफी फूहड़ ढंग से एक ऐसे शब्द के जरिये देने जा रहा हूँ जो बहुत घिसा-पिटा शब्द है : वह शब्द है प्रेम। आप इसका जितना ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, यह उतना ही ज्यादा मजबूत होता जाता है। और इस शब्द का दुरुपयोग करने में भी कोई नुकसान नहीं होता है।’’

नेरुदा की ही एक पंक्ति है : ‘‘कितना संक्षिप्त है प्यार और भूलने  का अरसा कितना लम्बा।’’
सिर्फ 23 वर्ष की उम्र में ही अपने संकलन ‘प्रेम की बीस कविताएँ और निशाद का एक गीत’ से विश्व प्रसिद्ध हो चुके प्रेम के कवि नेरुदा एक निष्ठावान कम्युनिस्ट थे। वे एक कवि और कम्युनिस्ट के अलावा एक राजदूत दुनिया भर में शरण के लिए भटकते राजनीतिक शरणार्थी चिले के पार्लियामेण्ट में सिनेटर और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी थे। वे आम लोगों और सारी दुनिया के साहित्य प्रेमियों के प्रिय रहे, तो समान रूप से हमेशा विवादों में भी घिरे रहे। उनकी कविता की तरह ही उनका समूचा जीवन कम आकर्षक नहीं रहा है।

यह पुस्तक प्रेम की कम्युनिस्ट कवि के सम्मोहक जीवन के बिना किसी अतिरंजना के एक प्रामाणिक तस्वीर पेश करती है। इसे पाब्लो नेरुदा पर हिन्दी में अपने ढंग की एक अकेली किताब कहा जा सकता है।
सीधी-सी बात

शक्ति होती है मौन ( पेड़ कहते हैं मुझसे )
और गहराई भी ( कहती हैं जड़ें )
और पवित्रता भी ( कहता है अन्न )

पेड़ ने कभी नहीं कहा :
'मैं सबसे ऊँचा हूँ !'

जड़ ने कभी नहीं कहा :
'मैं बेहद गहराई से आयी हूँ !'

और रोटी कभी नहीं बोली :
'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा !'

पाब्लो नेरूदा एक कैदी की खुली दुनिया
अरुण माहेश्वरी
राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य--१५० रूपये