Wednesday, November 28, 2012

क़ब्रों में बंद आवाज़े

क़ब्रों में बंद आवाज़े
यदि बोल सकती तो
पूछती उनसे
क्या वाकई
मिलता है दिली सकून
यहाँ भीतर
बिना किसी आहट
के एहसास में जीना
और खुद से ही घंटों बाते करना
सवाल भी खुद और
जवाब भी खुद ही बनना
और क्या यह वाकई
अलग से उस एहसास से
जो मैं यहाँ चलते फिरते
हुए महसूस किए करती हूँ ?

21 comments:

vandan gupta said...

और क्या यह वाकई
अलग से उस एहसास से
जो मैं यहाँ चलते फिरते
हुए महसूस किए करती हूँ ?

ज़िन्दा कब्रे भी उन्ही अहसासो से गुजरती हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

अकेले में जीना तो सबको पड़ता है..

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

अकेलेपन की इन्‍तहा

Vinay said...

Very NICE

यदि फ़ीडबर्नर बंद हुआ तो आपके पास क्या विकल्प हैं?

shikha varshney said...

आप पूछ सकें तो मेरी तरफ से भी पूछियेगा कि क्या शोर नहीं करती इतनी शान्ति, नहीं फटने लगते कान सन्नाटे की आवाजों से ....

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

यहाँ भीतर
बिना किसी आहट
के एहसास में जीना
और खुद से ही घंटों बाते करना
सवाल भी खुद और
जवाब भी खुद ही बनना,,,,बेहतरीन प्रस्तुति,,,

resent post : तड़प,,,

Mahi S said...

सुकून...ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता...पता नहीं क्‍या ठिकाना है इसका..

ये तस्‍वीर तो जयपुर की लगती है...

ANULATA RAJ NAIR said...

कब्र के भीतर सुकून???
हाँ शायद खुद से मिलने के लिए इससे बेहतर जगह क्या होगी...

विचारणीय रचना..
सस्नेह
अनु

रंजू भाटिया said...

haan sakun kahan hai yahi talash hai anu :)

रंजू भाटिया said...

nahi yah tajmahal ki hai mahi :)

रंजू भाटिया said...

shukriya dhirnedar ji

रंजू भाटिया said...

haan shikha jarur ..bas ek baar jauan to wahan :)

रंजू भाटिया said...

shukriya vinay

रंजू भाटिया said...

hmm kajal ji .shukriya

सदा said...

क्या वाकई
मिलता है दिली सकून
यहाँ भीतर
बिना किसी आहट
के एहसास में जीना
वाह ... बहुत खूब

रंजू भाटिया said...

sahi kaha ..praveen ji ..shukriya

रंजू भाटिया said...

haan vandana ..shayad ...shukriya

rashmi ravija said...

बिना किसी आहट
के एहसास में जीना

बहुत ही त्रासदायक है

Arvind Mishra said...

ओह!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कब्र का सन्नाटा भी बहुत शोर करता है ..... गहन रचना

Neeta Mehrotra said...

Awesome !!!