Monday, May 24, 2010

यादों के पल


जीवन की रेल पेल में
हर संघर्ष को झेलते
हर सुख दुःख को सहते
कभी मैंने चाही नही इनसे मुक्ति
पर कभी बैठे बैठे यूं ही अचानक
जब भी याद आई तुम्हारी
तब यह मन आज भी
भीगने सा लगता है
चटकने लगते हैं तन मन में
जैसे मोंगारे के फूल
और जैसे
सर्दी से कांपते बदन में
तेरी याद का साया
गुनगुनी धूप सी भर देता है

छेड़ता नहीं है कोई सरगम को
फ़िर भी एक संगीत दिल में
गूंजने लगता है ..
उतर जाते हैं कई आवरण
उन यादो से .
जिन्हें दिल आज भी संजोये हुए हैं
नही पड़ने देता दिल
इन पर वक्त का साया
क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !!

रंजना (रंजू ) भाटिया

36 comments:

कुमार राधारमण said...

प्रेमपूर्ण,भावमय प्रस्तुति।

Arvind Mishra said...

कविता वही श्रेष्ठ है जहाँ व्यष्टि की पीड़ा समष्टि से एकाकार हो जाती हो ..आपकी कवितायेँ बार बार यहे अहसास दिलाती हैं -बहुत सुन्दर !

स्वाति said...

दिल को छु गयी आपकी कविता , भाव रुपी मोतियों से पिरो कर बहुत सुंदर माला बनाई है आपने ....

दिलीप said...

waah ranjana ji bahut sundar abhivyakti...

अर्चना said...

sardi se kanpate .....dhoop si bhar deta hai--behad mitha andaaj. sachmuch hi gunguni dhoop ka ehasaas de gaya.

दिलीप said...

waah ranjana ji bahut sundar abhivyakti...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

उन यादो से .
जिन्हें दिल आज भी संजोये हुए हैं
नही पड़ने देता दिल
इन पर वक्त का साया
क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !

वाह , कितनी सुखद अनुभूति है....गर्मी में छाँव सी देती हुई रचना ....खूबसूरत

रंजना said...

रूमानी भावों की कोमल सुन्दर मनमोहक अभिव्यक्ति ....वाह !!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

प्रेम का कितना सुन्दर प्रतिमान. बहुत सुन्दर रचना.

Reetika said...

सर्दी से कांपते बदन में
तेरी याद का साया
गुनगुनी धूप सी भर देता है..

kitna sukhmay ehsaas...! komalta se paripoorna rachna!

संजय भास्‍कर said...

अच्छी लगी आपकी कवितायें - सुंदर, सटीक और सधी हुई।

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

प्रेममयी व् सुंदर कविता...

Alpana Verma said...

प्रेम में डूबे अहसास चाहे वे यादों के जल से भीगे क्यूँ न हों..जीवन के यथार्थ की कड़वाहट को बदलने की क्षमता रखते हैं यही आप की कविता समझा रही है मुझे भी..
भावों की बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति .

shikha varshney said...

क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !!
kitni sachchi baat ki hai aapne ..vakai kuchh pal hi kafi hote hain jine ke liye..
bhavpurn abhivyakti

Udan Tashtari said...

क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !


-बहुत सुन्दरता से कहा इस बात को..वाह!!

आनन्द आया इस कविता को पढ़कर.

राजकुमार सोनी said...

आपकी संवेदनशीलता इसी तरह बनी रहे और अच्छी रचनाएं सामने आती रही।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

किसी खास की याद भीतर से तोड ही देती हो और वो भी अगर वो बैठे बैठे यूं ही अचानक आ जाय...लेकिन वही यादे जीवन के कड़वे यथार्थ को कुछ तो समृद्ध बना देते हैं...

हमेशा की तरह काफ़ी कुछ छुपाये हुए..

Razi Shahab said...

bahut khoob

Ra said...

बहुत सुन्दर रचना ....हर पंक्ति लाजवाब .....सुन्दर सृजन

ZEAL said...

सुंदर कविता !

Anonymous said...

ati sundar....

सर्दी से कांपते बदन में
तेरी याद का साया
गुनगुनी धूप सी भर देता है

मीनाक्षी said...

रंजना, आपकी कविताएँ भी शीतल छाया सी लगती हैं..

दिगम्बर नासवा said...

यादें अक्सर तपते रेगिस्तान में .... बारिश ई बूँद बन कर आती हैं ...
बहुत ताज़पन लिए है रचना ....

अंजना said...

बहुत सुन्दर रचना ....

Abhishek Ojha said...

यादों के पल सच में ऐसे ही तो होते हैं...

Rajat Yadav said...

तन-मन में मोंगरे के फूलों के चटकने की कल्पना से मन अत्यंत प्रफुल्लित हो उठा.
हा हा हा
आप भी न ! क्या खूबसूरत कल्पना करती हैं.

श्रद्धा जैन said...

नही पड़ने देता दिल
इन पर वक्त का साया
क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !!

bahut sachchi baat ......yahi lamhe hai jinse jeene ka housla hai

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह पोस्ट ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
http://charchamanch.blogspot.com/

Dr.R.Ramkumar said...

जब भी याद आई तुम्हारी
तब यह मन आज भी
भीगने सा लगता है
चटकने लगते हैं तन मन में
जैसे मोंगारे के फूल
और जैसे
सर्दी से कांपते बदन में
तेरी याद का साया
गुनगुनी धूप सी भर देता है

बहुत सहज किन्तु गहराई लिए स्नेहिल बिंब..कोई बनावट नहीं है इसलिए सार्थक है..

Anonymous said...

आपकी रचनाधर्मिता से ब्लॉग जगत प्रभावित है. आपकी रचनाएँ भिन्न-भिन्न विधाओं में नित नए आयाम दिखाती हैं. 'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग एक ऐसा मंच है, जहाँ हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं. रचनाएँ किसी भी विधा और शैली में हो सकती हैं. आप भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 2 मौलिक रचनाएँ, जीवन वृत्त, फोटोग्राफ भेज सकते हैं. रचनाएँ व जीवन वृत्त यूनिकोड फॉण्ट में ही हों. रचनाएँ भेजने के लिए मेल- hindi.literature@yahoo.com

सादर,
अभिलाषा
http://saptrangiprem.blogspot.com/

अरुणेश मिश्र said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

Himanshu Mohan said...

बड़ी ज़िन्दा कविता है। बहुत ख़ूबसूरत।
मगर साथ ही एक टिप्पणी है आपकी "ख़त" कविता पर भी।
----------------
अब ये लगता है कि एक वो ख़त-
जिसमें प्यार भरा था,
एक वो-
जिसमें शिक्वा-गिला था,
सवाल ये नहीं बाक़ी कि इनमें
कौन सा ख़त था बुरा - कौन भला था;
कसक इस बात पे है कि कौन पहले-
कौन बाद में मिला था।
शुभकामनाओं सहित,

Asha Joglekar said...

नही पड़ने देता दिल
इन पर वक्त का साया
क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !
यही खूबसूरत प्यारी यादें जीवन के मुश्किल समय को आसान बना देती हैं । सुंदर प्रस्तुति ।

kavi kulwant said...

wow! great..
bahut khoob..
congrats..

वाणी गीत said...

छेड़ता नहीं है कोई सरगम को
फ़िर भी एक संगीत दिल में
गूंजने लगता है ..
उतर जाते हैं कई आवरण ...
इस अनछेड़े संगीत को सुनते है कितने आतुर मन ...कभी भिगोते पलकें , कभी तन -मन
अजब एहसास है यह भी ...
बहुत सुन्दर कविता ...!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच