Wednesday, June 17, 2015

नव- जीवन

अरे !सुधा, ऐसा सिर्फ बड़े लोगों और पिक्चर में होता है ,सच में क्या यह इतना आसान है। बेकार की बातें मत किया करो ,और यह कह कर राजेश कमरे से  बाहर निकल गया।
सुधा ,सुनो तो ! कहती रह गयी ,क्यों नहीं होता आखिर पिक्चरें भी तो आम जीवन की कहानी से बनती हैं। मैं आज रात वापस आने पर फिर से कोशिश करुँगी ,उन्हें मेरी बात समझनी होगी। सोच कर सुधा घर के काम में जुट गयी।
शाम होते ही सुधा ने उत्साह से खुद को तैयार किया ,पक्के इरादे का काजल आँखों में भरा ,कि आज तो अपनी बात मनवा के रहूंगी मैं किसी भी सूरत में।
तभी डोर बेल बजी ,सुधा ने लपक कर दरवाज़ा खोला ,आते ही राजेश ने सुधा को बाहों में भर लिया और कहा तुम्हारी बात मानने को में तैयार हूँ ,हैं ! आखिर ऐसा क्या हो गया सुबह से शाम तक में जो तुम खुद मान गए ?कुछ नहीं ,बस समझो ईश्वर ने रास्ता दिखाया ,आज मनोहर की बहन को उसके सुसराल वालों ने घर से निकाल दिया यह कह के कि वह माँ नहीं बन सकती ,मैं नहीं चाहता की तुम्हारी छोटी बहन रीमा के साथ भी कुछ ऐसा हो ,मैंने इरादा कर लिया है ,मैं" स्पर्म डोनेट "करने को तैयार हूँ। तुम रीमा और राहुल को  मेरी हाँ बता दो। सुनते ही सुधा की बाहों में खेलते नन्हे राघव की किलकारी रंगबिरंगे फूल सी खिल गयी आर एक नन्हा सा पौधा रीमा के आँगन में पनपता दिखने लगा !!

12 comments:

Unknown said...

Nice post Ranjana... Cheers, Archana - www.drishti.co

Unknown said...

Lovely...

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर नंगी क्या नहाएगी और क्या निचोड़ेगी { चर्चा - 2010 } पर दिया जाएगा
धन्यवाद

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बढ़िया

रश्मि शर्मा said...

मन छूने वाली कहानी।

Unknown said...

सुन्दर रचना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हुए , बेहतरीन अभिब्यक्ति

कभी इधर भी पधारें

Onkar said...

बढ़िया पोस्ट

वन्दना अवस्थी दुबे said...

वाह... बहुत बढिया लघु कथा.

Sanjay Kumar Sharma said...

सुन्दर

Master ji said...

वाह वाह क्या बात है....वाकई इस लघुकथा में तुमने तो सजीव वर्णन कर दिया....आपकी जय जय...जय हो.

Master ji said...

आपकी इस लघुकथा में तो सजीव.वर्णन है....आपकी..जय जय जय ....जय हो.

Master ji said...

अति सुंदर प्रस्तुति.