Tuesday, October 11, 2011

चाँद कुछ कहता है

आज शरद पूर्णिमा का चाँद है ...गोल चमकता हुआ ..और कुछ दिन बाद यह चाँद करवाचौथ का चाँद होगा ............इन्तजार करवाता ..प्रेम के एहसास में डूबा हुआ .........आसमान पर निकला चाँद ,हर लिखने वाली की प्रेरणा है ,बचपन में वह बच्चो का मामा है ,और एक कल्पना जिस में बैठी बूढी नानी चरखा कात रही है और वही चाँद जवानी में एक प्रेमी /प्रेमिका कि हर बात को कहने का जरिया ...


चाँद कुछ कहता है
कहा था उसने
चाँदनी रात के साए में
तनिक रुको,
अभी मुड कर आता हूँ मैं ..
तब से
भोर के तारे को
मैंने उसके इन्तजार में
रोक कर रखा है ....

वह इन्तजार कभी खत्म होने पर नहीं आता ...और एक अजब सी उदासी का एहसास शिद्दत से दिल को यह कहने पर मजबूर कर देता है

सितारों के बीच में
तन्हा चाँद
और भी उदास कर जाता है
तब शिद्दत से होता है
एहसास ..
कि
विरह का यह रंग
सिर्फ़ मेरे लिए नही है ....


चाँद हर रोज़ अपने नए रंग रूप में आ कर लुभाता है और हर तरह से किसी भी दिल को कुछ न कुछ कहने पर मजबूर कर जाता है ..हर चाँद का रोमांस अलग है रोमांच अलग है ...

भीगा चाँद
टप टप टपकते मेह सा
सिला सा -अधजगा सा
तन्हाई में लिपटा
धीरे धीरे दस्तक देता रहा
नज़रो से बरसता रहा

अमावस का चाँद
तेरे मेरे मिलन के
बीच ढला
एक न ख़त्म
होने वाला अँधेरा


पूर्णिमा का चाँद
यूँ निकला
तमस के
अंधेरों को चीर कर
जैसे कोई
ख़त तेरे आने की
ख़बर दे जाए ....


और कभी यह लगता है गोल फ़ुटबाल सा ....

चाँद
यह गोल फुटबाल
को  किसने टांगा
अम्बर पर
कल तो यह
मैदान में
खेलते हुए देखा था


कभी यह एहसास देता है बाहों में बंदी होने का और फिर उस से दूर होने का

चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी  सा
अब बादलों में छिपता है

कभी कभी दिल करता है कि अपनी बंद मुट्ठी में इस चाँद को बंद कर लूँ और दुनिया को भी बता दूँ
चाँद  की  फितरत


मुट्ठी
में भर
छिपा लूँ सारी चाँदनी
बैरी जग को बता दूँ
कि जिसे वो  

दाग़दार समझता है
वो ही चाँद  

उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..

कभी कभी चाँद जब आपकी खिड़की से झाँकने लगता है तो यूँ लगता है जैसे वह अपन पास बुला कर कुछ कह रहा हो ...तब अनायास ही यह पंक्तियाँ दिल से निकल जाती है

कल रात हुई
इक हौली सी  आहट
झांकी खिड़की से
चाँद की मुस्कराहट
अपनी फैली बाँहों से 
जैसे किया उसने
कुछ अनकहा सा इशारा
मैंने भी न जाने,
क्या सोच कर
बंद किया हर झरोखा
और कहा ,
रुक जाओ....
बहुत सर्द है यहाँ
 ठहरा सहमा है हुआ
हर जज्बात....
शायद तुम्हारे यहाँ होने से
कुछ पिघलने का एहसास
इस उदास दिल को हो जाए
और दे जाए
कुछ धड़कने जीने की
कुछ वजह तो
 अब जीने की बन जाए !!

पर चाँद कहाँ सुनता है वह आता है ,जाता है और अंत में दिल चाँद  की इस शरारत से चाँद को कह उठता है

कुछ दिन
नभ पर
हमें भी तो
चमकाने दो
जाओ चाँद
तुम छुट्टी पर....

24 टिप्पणियाँ:

S.N SHUKLA said...

सुन्दर प्रस्तुति, बधाई स्वीकारें

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

प्रवीण पाण्डेय said...

चाँद सदियों से बतिया रहा है, राह दिखा रहा है।

shikha varshney said...

अलग अलग रूपों में चाँद ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

Kailash C Sharma said...

सितारों के बीच में
तन्हा चाँद
और भी उदास कर जाता है
तब शिद्दत से होता है
एहसास ..
कि
विरह का यह रंग
सिर्फ़ मेरे लिए नही है ..

....चांद के विभिन्न रूप...सभी एक से एक बढ़ कर...लाज़वाब प्रस्तुति..

fahi said...

Great goin.
wish you luck.
MAY GOD BLESS YOU..!!

सदा said...

वाह ...बहुत ही बढि़या चांद का जिक्र आपकी कलम से ... अनुपम प्रस्‍तुति ।

Arvind Mishra said...

वाह आज के चाँद की चौदह कलाओं में से कुछ कलाएं !

BOOBAI said...

bahot achha likha hai

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इतने सारे चांद? एक साथ? वाह!!

sushma 'आहुति' said...

चाँद के सभी रूप बहुत ही खुब्सुअरती से रचनायों में प्रस्तुत किये आपने.....

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut hee sundar prastuti...

वन्दना said...

चाँद के विभिन्न रुपो का बहुत सुन्दर चित्रण किया है।

Mukesh Kumar Sinha said...

chand ke vibhinn ayaaam:)

आशा जोगळेकर said...

पूर्णिमा का चाँद
यूँ निकला
तमस के
अंधेरों को चीर कर
जैसे कोई
ख़त तेरे आने की
ख़बर दे जाए ....


चांदनी बिखेरती सी चांद की बातें ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

..बहुत सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

Onkar said...

chand ke kitne saare rupon ki kalpana aapne ki hai aur unhe kitni sundar abhivyakti di hai

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सच चाँद बहुत कुछ कहता है ... अच्छी प्रस्तुति

anjana said...

अच्छी प्रस्तुति..........

chirag said...

bahut khoob

दिगम्बर नासवा said...

पूर्णिमा का चाँद तो सीधे दिल में उतर गया ...
अलग अलग शेड्स में चाँद को उतारना और फिर भी उसकी ताजगी बनाए रखना ... बहुत ही दुष्कर कार्य को आसान किया है आपने ...
बहुत ही लाजवाब हैं सभी रचनाएं ...

अभिषेक मिश्र said...

चाँद से जुड़े विभिन्न अहसासों की सुन्दर अभिव्यक्ति.

ePandit said...

सुन्दर रचना। चाँद को कितने आयाम दे दिये आपने।

S.K.Jhingan said...

अरे! आप तो खुद भी अमृता प्रीतम जैसी लगने लगीं.कुछ वैसा ही लिखने लगीं. सच; मजाक नहीं कर रहा. बस इसी तरह लगी रहो और लिखती रहो.
skjhingan

BANWARI SHARMA said...

चाँदनी रात के हमसफ़र खो गये चाँदनी रात में
बात करते हुए रह गये, क्या हुआ बात ही बात में

ज़िन्दगी भी तमाशाई है, हम रहे सोचते सिर्फ़ हम
देखती एक मेला रही, हाथ अपना दिये हाथ में

जिनका दावा था वो भूल कर भी न लौटेंगे इस राह पर
याद आई हमारी लगा आज फिर उनको बरसात में

जब सुबह के दिये बुझ गये, और दिन का सफ़र चुक गया
साँझ तन्हाईयाँ दे गई, उस लम्हे हमको सौगात में

तालिबे इल्म जो कह गये वो न आया समझ में हमें
अपनी तालीम का सिलसिला है बंधा सिर्फ़ जज़्बात में

आइने हैं शिकन दर शिकन, और टूटे मुजस्सम सभी
एक चेहरा सलामत मगर, आज तक अपने ख़्यालात में

मेरे अशआर में है निहाँ जो उसे मैं भला क्या कहूँ
नींद में जग में भी वही, है वही ज्ञात अज्ञात में

ये कलामे सुखन का हुनर पास आके रुका ही नहीं
एक पाला हुआ है भरम, कुछ हुनर है मेरे हाथ में

ख़्वाहिशे-दाद तो है नहीं, दिल में हसरत मगर एक है
कर सकूँ मैं भी इरशाद कुछ, एक दिन आपके साथ में