जब करनी होती ख़ुद से बाते तो में कुछ लफ्ज़ यूँ दिल के कह लेती हूँ ....
ज़रा थम थम के रफ़्ता रफ़्ता चल ज़िंदगी कि यह समा या फ़िज़ा बदल ना जाए
अभी तो आई है मेरे दर पर ख़ुशी कही यह तेरी तेज़ रफ़्तार से डर ना जाए!! - रंजू
Tuesday, July 19, 2011
बुढापा ., कुछ यूँ ही .छोटी कविताएं .
बुढापा
चेहरे पर
रेखाओं का
जाल
बुढापा
पेट में दाना कम
और दवा अधिक
बुढापा
झूलता हुआ सा
कहे शरीर
अब तो पंछी
अपना नीड़ समेट
बुढापा एक गहरे अमुभव की पहचान तो है पर शारीरिक रुप से इतना लाचार कर देता है कि न रखने बनता है न बाहर निकलते। भय और संकोच से भावना की अभिब्यक्ति भी बहुत कुछा।
33 टिप्पणियाँ:
अक्षरश: सत्य कहती हर एक पंक्ति ...बेहतरीन प्रस्तुति के लिये बधाई ।
सटीक चित्रण किया है।
उफ़ ...पर है तो सत्य ही.
यथार्थ प्रस्तुति।बहुत सुंदर...
गागर में सागर ...
khoobsurat!
सत्य ... चंद लाइनों में कहा सत्य ... बुढापा ऐसे ही होता है ...
आदरणीया रंजना जी
सादर सस्नेहाभिवादन !
बहुत सही लिखा आपने
बहुत मननीय हुआ करती हैं आपकी रचनाएं हमेशा ही …
बुढापा अनुभवों का संचित ख़ज़ाना भी तो होता है
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
कम शब्दों मे यथार्थ को समेट लिया.
Bahut hi kam shabdon mein bahut gahri baat kahi aapne.. bahut sundar..
बुढापा एक गहरे अमुभव की पहचान तो है पर शारीरिक रुप से इतना लाचार कर देता है कि न रखने बनता है न बाहर निकलते। भय और संकोच से भावना की अभिब्यक्ति भी बहुत कुछा।
सच ! बुढापा ऐसे ही होता है हैल्पलैस...
budhapa.aksar yun hi bitata hai..
सत्य को कहती सटीक क्षणिकाएँ
शब्दशः सत्य।
अच्छी प्रस्तुति पर, क्या बात है रंजू जी इत्ती जल्दी कहां बुढापा अभी तो आप जवान हैं ।
चलिये आपको हंसाने के लिये एक बहुत पहले सुना हुआ एक शेर सुनाऊँ ।
लज्जत दिखा रहा है उनका गज़ब बुढापा
अंगूर के मज़े अब किशमिश मे आ रहे हैं ।
ओोववव
कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने।
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बेहतर लेखन की अनवरत प्रस्तुति...
अल्पना वर्मा सुना रही हैं विज्ञान समाचार..।
nice poem...truth lies in the lines of poem
sahee baat hai|
सटीक चित्रण
बहुत अच्छा लिखा.
दुनाली पर देखें-
अन्ना को मनमौन की जवाबी चिट्ठी
aapko badhayee ke saath aashaji ke comment ko LIKE.
chhoti va sundar rachna..
उदास करता यथार्थ आपने शब्दों में समेटा है...
जवानी घूम कर खाया
बुढापा देख कर रोया!!
फ़िक्र न करें..अपन भी आयेंगे इस जबड़े में!
param satya
बेहतरीन।
सादर
सार्थक प्रस्तुती...
कुछ जल्दी ही याद आने लगा.....:)
बढ़िया यथार्थ चित्रित किया है...
nice
bahut khub...par apne par bas kahan chalta hai....
"Expressions shown without showing any face."
Budhapa ped (tree ) ke peele patte ki tarah jise ehsas hai kabhi bhi gir sakta hoon.
Ravi Bhatia
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