Tuesday, July 19, 2011

बुढापा ., कुछ यूँ ही .छोटी कविताएं .

बुढापा

चेहरे पर
रेखाओं का  
जाल

बुढापा

पेट में दाना कम
और दवा अधिक


बुढापा
झूलता हुआ सा
कहे शरीर
अब तो पंछी
अपना नीड़ समेट 

33 टिप्पणियाँ:

सदा said...

अक्षरश: सत्‍य कहती हर एक पंक्ति ...बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये बधाई ।

वन्दना said...

सटीक चित्रण किया है।

shikha varshney said...

उफ़ ...पर है तो सत्य ही.

induravisinghj said...

यथार्थ प्रस्तुति।बहुत सुंदर...

Sonal Rastogi said...

गागर में सागर ...

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

khoobsurat!

दिगम्बर नासवा said...

सत्य ... चंद लाइनों में कहा सत्य ... बुढापा ऐसे ही होता है ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया रंजना जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

बहुत सही लिखा आपने

बहुत मननीय हुआ करती हैं आपकी रचनाएं हमेशा ही …
बुढापा अनुभवों का संचित ख़ज़ाना भी तो होता है


हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

अनामिका की सदायें ...... said...

कम शब्दों मे यथार्थ को समेट लिया.

Anil Avtaar said...

Bahut hi kam shabdon mein bahut gahri baat kahi aapne.. bahut sundar..

Kishore Kumar Jain said...

बुढापा एक गहरे अमुभव की पहचान तो है पर शारीरिक रुप से इतना लाचार कर देता है कि न रखने बनता है न बाहर निकलते। भय और संकोच से भावना की अभिब्यक्ति भी बहुत कुछा।

Maheshwari kaneri said...

सच ! बुढापा ऐसे ही होता है हैल्पलैस...

सुमन'मीत' said...

budhapa.aksar yun hi bitata hai..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सत्य को कहती सटीक क्षणिकाएँ

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्दशः सत्य।

Mrs. Asha Joglekar said...

अच्छी प्रस्तुति पर, क्या बात है रंजू जी इत्ती जल्दी कहां बुढापा अभी तो आप जवान हैं ।
चलिये आपको हंसाने के लिये एक बहुत पहले सुना हुआ एक शेर सुनाऊँ ।

लज्जत दिखा रहा है उनका गज़ब बुढापा
अंगूर के मज़े अब किशमिश मे आ रहे हैं ।

Mrs. Asha Joglekar said...

ओोववव

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

कम शब्‍दों में बहुत कुछ कह दिया आपने।

------
बेहतर लेखन की अनवरत प्रस्‍तुति...
अल्‍पना वर्मा सुना रही हैं विज्ञान समाचार..।

chirag said...

nice poem...truth lies in the lines of poem

निर्मला कपिला said...

sahee baat hai|

परमजीत सिँह बाली said...

सटीक चित्रण

एम सिंह said...

बहुत अच्‍छा लिखा.

दुनाली पर देखें-
अन्‍ना को मनमौन की जवाबी चिट्ठी

varsha said...

aapko badhayee ke saath aashaji ke comment ko LIKE.

Manav Mehta said...

chhoti va sundar rachna..

रंजना said...

उदास करता यथार्थ आपने शब्दों में समेटा है...

शहरोज़ said...

जवानी घूम कर खाया
बुढापा देख कर रोया!!

फ़िक्र न करें..अपन भी आयेंगे इस जबड़े में!

shephali said...

param satya

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन।


सादर

sushma 'आहुति' said...

सार्थक प्रस्तुती...

Udan Tashtari said...

कुछ जल्दी ही याद आने लगा.....:)

बढ़िया यथार्थ चित्रित किया है...

ranjana said...

nice

Prarthana gupta said...

bahut khub...par apne par bas kahan chalta hai....

Anonymous said...

"Expressions shown without showing any face."

Budhapa ped (tree ) ke peele patte ki tarah jise ehsas hai kabhi bhi gir sakta hoon.

Ravi Bhatia