Thursday, March 31, 2011

एक सवाल

हर सिहरते रिश्ते
को ,
जमीन देते हैं
चंद प्यार की फुहारे ,
विश्वास के बीज ,
और मौसम से
बदलते रंगों में
साथ चलने का
एहसास
पर .....
कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??



30 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

वाह ! रंजना जी,
इस कविता का तो जवाब नहीं !

shikha varshney said...

उफ़ क्या कह दिया ...जब जमीन ही भुरभुरी हो तो क्या उपाय करे कोई.
बहुत उम्दा ख़याल.

Kailash C Sharma said...

पर .....
कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??

आज के रिश्तों की वास्तविकता का बहुत सटीक चित्रण..बहुत सुन्दर

सदा said...

पर .....
कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??
बहुत खूब कहा है ...।

Ashok Pandey said...

सुंदर अभिव्‍यक्ति। अच्‍छा लगा आपकी कविता को पढ़ना।

Patali-The-Village said...

आज के रिश्तों की वास्तविकता का बहुत सटीक चित्रण| धन्यवाद|

Deepak Saini said...

रिश्ते अनमोल है
बहुत बहुत शुभकामनाये

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प !

Udan Tashtari said...

पर .....
कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??

-बहुत मुश्किल है..सुन्दर कविता.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??

विचारणीय प्रश्न है... बहुत उम्दा रचना

स्वाति said...

कैसे कोई निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??
बहुत खूब....

अल्पना वर्मा said...

एक गहरी टीस लिए हुए है कविता ..

chirag said...

kam words main bahut kuch kah dia
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Bahut gahra sawaal hai. Kya kaha jaaye kuchh samajh nahi aataa.

-----------
क्या ब्लॉगों की समीक्षा की जानी चाहिए?
क्यों हुआ था टाइटैनिक दुर्घटनाग्रस्त?

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??

आज तो हर रिश्ता शायद भुरभुरी मिट्टी से ही शुरू होता है और फिर दम तोड़ देता है ..

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा है ऐसे रिश्ते निभाना आसान नही ... लाजवाब लिखा है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 04 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

अजय कुमार said...

अब तो भुरभुरी जमीन वाले रिश्तों की बहुतायत है

वन्दना said...

यही तो रिश्तों का खोखलापन है……………सुन्दर रचना।

aarkay said...

कुछ ऐसा ही T .S . Eliot ने अपनी प्रसिद्द काव्य- रचना "The Waste Land " में कहा है:

".............where are the roots that clutch ,
what branches grow out of this stony rubbish ......"

सच में कुछ भी पनपने के लिए उपयुक्त ज़मीन का होना कितना आवश्यक है !

सुंदर भावाभिव्यक्ति !

M.kaneri said...

बहुत सुन्दर बहुत दर्द भरा है मेरे ब्लांग मे आप का स्वागत है.कभी पधारे.
धन्य बाद.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कविता और सवाल दोनों ही दिलचस्प और वज़नदार हैं।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया रंजना रंजू जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

आशा है सपरिवार स्वस्थ-सानन्द हैं !

आपकी अन्य रचनाओं की तरह गहरी संवेदना लिये' है यह कविता भी …
…कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिनकी ज़मीन ही भुरभुरी हो ??

रिश्तों का सत्य उकेरती संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए आभार !


बहुत समय हो गया , अब कुछ नया हो जाए … :)

* श्रीरामनवमी की शुभकामनाएं ! *
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया रंजना जी
प्रिय रंजू जी

आज आपका जन्मदिन है…
जीवन में खिलता रहे , बारह मास बसंत !
ख़ुशियों का सुख-हर्ष का , कभी न आए अंत !!


* जन्मदिवस की हार्दिक बधाई ! *

शुभाकांक्षी
- राजेन्द्र स्वर्णकार

संजय कुमार चौरसिया said...

aadarniya ranjna ji,

janm-din ki bahut bahut badhai evam dheron shubh-kaamnaayen ,


pahli baar aapke blog par aana hua ,

bahut achchhi kavita padne ko mili

संजय कुमार चौरसिया said...

aadarniya ranjna ji,

janm-din ki bahut bahut badhai evam dheron shubh-kaamnaayen ,


pahli baar aapke blog par aana hua ,

bahut achchhi kavita padne ko mili

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

Ranjana ji... kam aur saaf sabdon mein sundar anubhuti... janmdin kee badhayi v sweekaar kijiye...

Sawai Singh Rajpurohit said...

हर सिहरते रिश्ते
को ,
जमीन देते हैं
चंद प्यार की फुहारे ,
विश्वास के बीज ,
और मौसम से
बदलते रंगों में
साथ चलने का
एहसास
पर .....

बहुत खूब

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें....

Shree Ram Bissa said...

जय गणेश
अध्यात्म ज्योतिष दर्शन पर आपका स्वागत है ,
आशा है आप हमारी सेवाओं का लाभ उठाने के साथ - साथ इस सामाजिक ब्लॉग का लोक हित में प्रचार भी करेंगे !
धन्यवाद !
!! जय गणेश !!
!! जय गणेश !!

श्रीराम बिस्सा ( http://adhyatmjyotishdarshan.blogspot.com/ )
द्वारा जे. एम. बिस्सा
एम. डी. वी. नगर
बीकानेर (राज.)

Surendrashukla" Bhramar" said...

कैसे कोई
निभाये उन रिश्तों को
जिन की जमीन ही भुरभुरी हो ??
बहुत खूब कहा रंजना जी जिसकी जमीं ही भुरभुरी हो वो क्या निभाएंगे आज इसी का दौर है रेत पर खड़े महल न नीव न अपनापन -सब एक झोंका भी सह नहीं पाते तो हर हरा के ढह जाते हैं -बधाई हो

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५