चाँद
यह गोल फुटबाल
को किसने टांगा
अम्बर पर
कल तो यह
मैदान में
खेलते हुए देखा था
चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है
चाँद
मुट्ठी में भर
छिपा लूँ सारी चाँदनी
बैरी जग को बता दूँ
कि जिसे वो
दाग़दार समझता है
वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..
रंजना (रंजू ) भाटिया

24 टिप्पणियाँ:
sundar
आपके ब्लाग मे पहली बार आया । बहुत अच्छी कवितायें है आपकी । बधाई ।
"जिसे वो
दाग़दार समझता है
वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है"
बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति.
सुन्दर भाव संयोजन्।
वाह....क्या कल्पनाएँ हैं...
बहुत बहुत सुन्दर...
शब्द और चित्र मिलकर चाँद की ख़ूबसूरती को मन में बसा ,मन शीतल किये जा रही हैं...
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है
बेहद ख़ूबसूरत....करवा चौथ , पर चाँद की याद आना लाज़मी है.
बहुत सुंदर लिखा आपने !!
आखिरी वाली सबसे अच्छी लगी.
खूबसूरत शब्दोँ के चयन के साथ बेहद सुन्दर भावोँ को सँजोया हैँ आपने कविता मेँ। चाँद सी सुन्दर कविता के लिए आभार। -: VISIT MY BLOG :- पढ़िये मेरे ब्लोग "Sansar" पर नई गजल...........नजर नजर से मिले तो कोई बात बनेँ। http://vishwaharibsr.blogspot.com
bahut achchi lagi.
वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..
wah wah wah....kamal kar diya!
@ RASHMI DIDI NE BILKUL SAHI KAHA
करवा चौथ , पर चाँद की याद आना लाज़मी है.
चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है.
वाह!
क्या बात कही है!
बहुत सुंदर ....रंजनाजी
बहुत खूब ... सच में जिसको लोग दाग समझते हैं वो तो खूबसूरत तिल होता है ...
चाँदनी कितनी शीतल है ये कवि की कल्पना ही बता सकती है ... बहुत लाजवाब लिखा है ...
चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है
बहुत ही सुन्दर लगा. इतनी खूबसूरत छाया पढ़ कर आनन्द आ गया।
वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..
bahut khubh...chand bhi aur aapki leknie ki chandni bhi...tarif ke kabil hai...
आपके ब्लाग मे पहली बार आया हूँ जी।
बहुत अच्छी लगी यह कविता।
कल पूज्या निर्मला जी से बात हुई थी। आपका जिक्र हुआ।
आपको सब मिलना चाहते हैं।
क्षमाप्रार्थी हूँ, आपकी प्रोफाइल पर मेल आईडी नहीं मिला तो यहां लिख रहा हूँ।
प्रणाम स्वीकार करें
बहुत खूब रंजना जी।
बहुत खूबसूरत क्षणिकाएं ...
चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है
यह बेहद पसंद आई
चॉंद को बहुत खूबसूरती से शब्दों में उकेरा गया है।
---------
सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।
सुंदर क्षणिकाएं.
familiar si lagi lines mujhe...ise aap tareef bhi samajh sakte hai
http://pyasasajal.blogspot.com/2010/10/blog-post.html
दिवाली की बहुत सारी मीठी मीठी शुभकामनाएँ...क्या नयी मिठाई बनायी इस बार??
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