Monday, October 25, 2010

चाँद बंदी था कल यही

चाँद
यह गोल फुटबाल
को किसने टांगा
अम्बर पर
कल तो यह
मैदान में
खेलते हुए देखा था




चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है


चाँद  
मुट्ठी में भर
छिपा लूँ सारी चाँदनी
बैरी जग को बता दूँ
कि जिसे वो  

दाग़दार समझता है
वो ही चाँद  

उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..


रंजना (रंजू ) भाटिया



24 टिप्पणियाँ:

माधव( Madhav) said...

sundar

dipayan said...

आपके ब्लाग मे पहली बार आया । बहुत अच्छी कवितायें है आपकी । बधाई ।

PN Subramanian said...

"जिसे वो
दाग़दार समझता है
वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है"
बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति.

वन्दना said...

सुन्दर भाव संयोजन्।

रंजना said...

वाह....क्या कल्पनाएँ हैं...
बहुत बहुत सुन्दर...
शब्द और चित्र मिलकर चाँद की ख़ूबसूरती को मन में बसा ,मन शीतल किये जा रही हैं...

rashmi ravija said...

बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है

बेहद ख़ूबसूरत....करवा चौथ , पर चाँद की याद आना लाज़मी है.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लिखा आपने !!

अभिषेक ओझा said...

आखिरी वाली सबसे अच्छी लगी.

Dr. Ashok palmist blog said...

खूबसूरत शब्दोँ के चयन के साथ बेहद सुन्दर भावोँ को सँजोया हैँ आपने कविता मेँ। चाँद सी सुन्दर कविता के लिए आभार। -: VISIT MY BLOG :- पढ़िये मेरे ब्लोग "Sansar" पर नई गजल...........नजर नजर से मिले तो कोई बात बनेँ। http://vishwaharibsr.blogspot.com

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..

wah wah wah....kamal kar diya!

संजय भास्कर said...

@ RASHMI DIDI NE BILKUL SAHI KAHA
करवा चौथ , पर चाँद की याद आना लाज़मी है.

अल्पना वर्मा said...

चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है.

वाह!
क्या बात कही है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर ....रंजनाजी

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... सच में जिसको लोग दाग समझते हैं वो तो खूबसूरत तिल होता है ...
चाँदनी कितनी शीतल है ये कवि की कल्पना ही बता सकती है ... बहुत लाजवाब लिखा है ...

arbuda said...

चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है

बहुत ही सुन्दर लगा. इतनी खूबसूरत छाया पढ़ कर आनन्द आ गया।

अशोक लालवानी said...

वो ही चाँद
उसकी जिंदगी में
शीतल छाँव भरता है..

bahut khubh...chand bhi aur aapki leknie ki chandni bhi...tarif ke kabil hai...

अन्तर सोहिल said...

आपके ब्लाग मे पहली बार आया हूँ जी।
बहुत अच्छी लगी यह कविता।

कल पूज्या निर्मला जी से बात हुई थी। आपका जिक्र हुआ।
आपको सब मिलना चाहते हैं।

क्षमाप्रार्थी हूँ, आपकी प्रोफाइल पर मेल आईडी नहीं मिला तो यहां लिख रहा हूँ।

प्रणाम स्वीकार करें

NK Pandey said...

बहुत खूब रंजना जी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत क्षणिकाएं ...


चाँद
बंदी था कल यही
शाखाओं की बाहों में
फरार हुए कैदी सा
अब बादलों में छिपता है

यह बेहद पसंद आई

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

चॉंद को बहुत खूबसूरती से शब्‍दों में उकेरा गया है।

---------
सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्‍कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।

अनामिका की सदायें ...... said...

सुंदर क्षणिकाएं.

Pyaasa Sajal said...

familiar si lagi lines mujhe...ise aap tareef bhi samajh sakte hai


http://pyasasajal.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

अल्पना वर्मा said...

दिवाली की बहुत सारी मीठी मीठी शुभकामनाएँ...क्या नयी मिठाई बनायी इस बार??