
कविता में उतरे यह लफ्ज़
ज़िन्दगी की टूटी हुई
कांच की किरचें हैं
यूँ ही ढाल लेती हूँ
इन्हें लफ्जों में
फ़िर सहजती हूँ
इन्ही दर्द के एहसासों को
सुबह अलसाई ....
ओस की बूंदों की तरह
अपनी बंद पलकों में...
और अपने अस्तित्व को
तलाशती हूँ इनमें ...
पर ,हर सुबह
यह तलाश वही थम जाती है..
सूरज की जगमगाती
उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है..
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है....
38 टिप्पणियाँ:
कविता में उतरे यह लफ्ज़
ज़िन्दगी की टूटी हुई
कांच की किरचें हैं
यूँ ही ढाल लेती हूँ
वाह बहुत खुब एक सुबह को तलाशती कविता....
जिंदगी की तरह उलझी उलझी लगी कविता।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
दर्द को बड़े ही खूबसूरत अंदाज में आपने शब्दों का चोला पहनाया है ......बहुत बहुत लाजवाब रचना...
यही तो जीवन है. सुन्दर रचना.
यही तो जीवन है. सुन्दर रचना.
हर सुबह
यह तलाश वही थम जाती है..
सूरज की जगमगाती
उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है..
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है....
बहुत खुब!!!
आपकी भावनाओं की अभिव्यक्ति लाजवाब होती है...बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए..
नीरज
bahut sunder rachana
हर सुबह
यह तलाश वही थम जाती है..
सूरज की जगमगाती
उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है..
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है.
rat के andhere और दिन के ujaale में यही तो farak है......... लाजवाब kavitaa है.... हर रोज़ एक nayee umeed jagaati... jeena kaa bahaana deti
mujhe kavita bahut bahut bahut achchhi lagi
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है..
यही इंसानी फितरत है ,टूट कर चूर -चूर होने के बाद भी जीने के बहाने तलाश लेना .
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है...
sunder...... aas hi to zindgi hain
ek aas jo ......bahaana de jaati hai.
--bahut hi achchhi lagi.
सूरज की जगमगाती
उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है.....
बहुत ही गेय रचना है ,बधाई.
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है..
bahut hi khubsurat abhivyakti hai dil ki uljhano ko suljhane ki chahat ki!
'उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है..'
behad hi sundar panktiyan hain!
bahut achchee rachna lagi.
है अजब सी छट पटाहट घुटन कसकन यह असह पीड़ा
समझ लो साधना की अवधि पूरी है
अरे घबरा न मन चुपचाप सहता जा
सर्जन में दर्द का होना जरूरी है....
रंजना आपकी इस रचना में सृजन के दर्द को साफ़ महसूस किया जा सकता है...यूँ ही घुमते टहलते आपके ब्लॉग तक पहुंचा था, पर अब साइबर स्पेस में भिडंत होती रहेगी....
सुंदर शब्दों से लिखे गए जिदंग़ी के भाव। हम कब लिख पाऐगे ऐसे भाव?
zindgi ki tooti hui kaanch ki kirchen jab armaanon ke phoolon ki pankhudiyan ban kar panth par prasar jaayen toh srijankarta santusht ho jata hai aur creation ruk jata hai isiliye shayad vidhaata hamen vedna deta hai taki hum samvedna k geet gaate rahen aur ghame-jana ko nahin ghame-dauran ko gungunaate rahen
AAPKI RACHNA BADI UMDA AUR AALA HAI.............................badhaai !
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है....
-अद्भुत रंग है कविता का. सुन्दर और गहन!!
रंजना जी,
सधे हुये शब्दों में जीवन को बयाँ कर दिया। जीवन एक खोज की तरह ही है, अपनी उम्मीद की खोज या जीने के लिये एक उम्मीद पालने की।
दर्द भरे शब्दों से रचा हुआ संसार, बहुत सुन्दर।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
'एक आस जो खो गयी है कहीं, वह रात आने तक जीने का एक बहाना दे जाती है।
'
एहसासों को लफजों में पिरोने की कला कोई आपसे सीखे।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
आशाओं की किरण चमकाती
सुन्दर रचना।
ranjana ji
main bahut der se aapki is kavita par thahra hua hoon .. kya kahun .. i am speachless for the expression of your words.... man bheeg sa gaya hai ..
is sajiv chitran ke liye aapko badhai ..
vijay
pls read my new sufi poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/06/blog-post.html
अस्तित्व की अथक तलाश,जो है,पर ........
मर्म को उभारती रचना
बहुत ही सुंदर शब्दों से संजोया है, वो छिड़काव नज़र मे आ रहा है जो रोज़ना की जिंदगी कुछ खास का एहसास दे जाता है।...
वाह वाह.... वाह वाह...
Atyant prabhavi aur bhavpurn abhivyakti.
आपकी इस रचना ने आत्मा तक को जगा दिया..मन को लुभाने वाले ये शब्द हमेशा बहुत ही अच्छे लगते हैं......
एक बार फिर से बहुत ही अच्छा लिखा है..........
उत्कृष्ट अभिव्यक्ति
वो जिसे कहते है उम्मीद
हर सुबह is दरवाजे पे
आवाज देने आती है......
ranjanaa jee kal aapake nlog par aayee tabhee light chali gayee aaj fir se teen chaar baar kavitaa ko padhaa dil ko choo gayee vaise to main aapkee kalam kee kaayal hooMM hee aur aap par tippanee karate hue aisa lagataa hai jaise sooraj ko deepak dikhaa rahee hooMM aur kyaa kah sakatee hoon bahut dilkash likhatee hain aap
सूरज की जगमगाती
उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर
चमक जाती है..
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है....
जिंदगी के तमाम मुश्किलों के बावज़ूद यह आस की किरण ही तो है जो हमें जीने के लिये जिंदगी से संघर्ष के लिये प्रेरित करती है । सुंदर अभिव्यक्ती ।
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है
bahut khoob...
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है....
Really very nice pls keep it..
आह! रंजना जी की बेमिसाल लेखनी का एक और चमत्कार...
बहुत सुंदर !
"सूरज की जगमगाती / उम्मीद की किरण...
जब बिंदी सी माथे पर / चमक जाती है..
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक / जीने का एक बहाना दे जाती है"
वाह!
एक आस जो,
खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती
waah bahut khub,sach aas se hi zindagi bandhi hai,sunder rachana.
Kya Kahun Aapki Rachna K Liye...Baar-Baar Padhne Ko Jee Caah Rha Hai...Kitni Khoobsoorati Se Aapne Shabdon Ko Piroya Hai...Badhayi
ak najuk si rachna bhut kuch kah jati hai.
जीने का बहाना ही जब जीवन का ढर्रा बन जाये, तो लगता है की हम जीते हैं खाने के लिए.
वस्तुतः जीवन के अबूझे सवालों से संघर्ष कर जीवन ज्यादा जिंदादिल प्रतीत होता है.....................
सकारक्त्मकता की खोज में ..............
चन्द्र मोहन गुप्त
एक आस...
मैं जब भी आपको पढ़ता हूं मुझे कुछ नया मिलता है अपनी जिंदगी मे ढूढ़ने के लिए।
बहुत ही सुंदर शब्दों से बुना गया है इस कविता को।
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