Friday, July 25, 2008

खामोश जुबान ,खामोश फिजां


खामोश जुबान ,खामोश फिजां
एक राह ...
तेरे दिल की पगडण्डी से
मेरे दिल के ...
किसी कोर को हौले से छूती
अक्षरों के साए से गुजरती ...
कागज़ की सलवटों में उलझ कर
एक आहट सी दे कर '
.अपने खामोश क़दमों से
वक्त की रेत पर अपने निशाँ
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
--

25 comments:

शोभा said...

रंजू जी
वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति है। बधाई स्वीकारें।

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!

कितनी रूहानी बात कही है आपने रंजू जी.. उम्दा! वाकई बहुत बढ़िया लिखी गयी है

Akash said...

bahut khoob

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुंदरतम रचना।

मोहन वशिष्‍ठ said...

हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!


वाह रंजू जी बहुत अच्‍छी कविता काबिलेतारीफ बधाई हो

अनुराग said...

यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!


subhan allah.....in dino aap dil ko choo rahi hai aor behad kareeb se....yakeenan ek khoobsorat ahssas....lajavab....

अजित वडनेरकर said...

सुंदर रचना....

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

बेहतरीन!

रश्मि प्रभा said...

bahut hi chhu janewali rachna....

Amma said...

बहुत अछे जज्बातों का प्रवाह है
बहुत सुन्दर...

महेन said...

दर्द कहाँ है? रोमांस ही रोमांस है और फ़िर लोग यह भी कह देते हैं कि उम्र हो गई है। पढ़कर तो नहीं लगता। ;-)

Udan Tashtari said...

क्या बात है...अति सुन्दर!!!

Manvinder said...

Ranjana
Bahut khoosurt andaaj hai
Manivnder

seema gupta said...

हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है

"bhut khubsurat khyal, behtreen"

Dr. Surendra Pathak said...

bahut khub

नीरज गोस्वामी said...

आप के लफ्जों ने बाँध लिया है हमको..छटपटा रहे हैं लेकिन छूट नहीं पा रहे...बेहद खूबसूरत रचना.
नीरज

Ila's world, in and out said...

क्या बात है रंजूजी? इस बार तो रुह छू ली आपने.

रंजना said...

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है आपने कि पढ़कर मुंह से अनायास ही ''वाह'' निकल जाता है.बहुत सुंदर.

ilesh said...

.अपने खामोश क़दमों से
वक्त की रेत पर अपने निशाँ
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,

abhivakti..bhav ne dil pe halki si dashtak dedi....beautiful....

advocate rashmi saurana said...

Ranju ji, bhut sundar rachana. badhai ho. likhti rhe.

Saee_K said...

bahut hi sundar rachana....

aapko pehli baar padha..padhte hi kayal ho gaye aapki lekhni ke..

हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!

itni sundar rahchana..baantne ke liye shukriya..

Jugal Gaur said...

यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है.....
रंजना जी ! पढ़कर ही मुंह से निकल जाता है बहुत खूब सुरत, आपकी रचना बहुत सुन्दर है !
इस मनोहर रचना का शुक्रिया .........

अभिषेक ओझा said...

मुझ जैसे नीरस आदमी को भी ये लाइने पसंद आ जाती हैं... इधर आप लिख देती हैं उधर अनुरागजी... यूँ ही लिखती रहे लगता है एक दिन मुझे भी शायर बना देंगे आप दोनों !

.Jitin said...

very nice ranjana ji. superb...

mukesh said...

हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!


bahut hi sunder panktiya.

badhiya

 
© Copyright by कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **  |  Template by Blogspot tutorial