
खामोश जुबान ,खामोश फिजां
एक राह ...
तेरे दिल की पगडण्डी से
मेरे दिल के ...
किसी कोर को हौले से छूती
अक्षरों के साए से गुजरती ...
कागज़ की सलवटों में उलझ कर
एक आहट सी दे कर '
.अपने खामोश क़दमों से
वक्त की रेत पर अपने निशाँ
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
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बिना लेड की पेंसिल को 'लेड पेंसिल' क्यों कहते हैं?
16 hours ago







25 comments:
रंजू जी
वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति है। बधाई स्वीकारें।
चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
कितनी रूहानी बात कही है आपने रंजू जी.. उम्दा! वाकई बहुत बढ़िया लिखी गयी है
bahut khoob
सुंदरतम रचना।
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
वाह रंजू जी बहुत अच्छी कविता काबिलेतारीफ बधाई हो
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
subhan allah.....in dino aap dil ko choo rahi hai aor behad kareeb se....yakeenan ek khoobsorat ahssas....lajavab....
सुंदर रचना....
बेहतरीन!
bahut hi chhu janewali rachna....
बहुत अछे जज्बातों का प्रवाह है
बहुत सुन्दर...
दर्द कहाँ है? रोमांस ही रोमांस है और फ़िर लोग यह भी कह देते हैं कि उम्र हो गई है। पढ़कर तो नहीं लगता। ;-)
क्या बात है...अति सुन्दर!!!
Ranjana
Bahut khoosurt andaaj hai
Manivnder
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है
"bhut khubsurat khyal, behtreen"
bahut khub
आप के लफ्जों ने बाँध लिया है हमको..छटपटा रहे हैं लेकिन छूट नहीं पा रहे...बेहद खूबसूरत रचना.
नीरज
क्या बात है रंजूजी? इस बार तो रुह छू ली आपने.
भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है आपने कि पढ़कर मुंह से अनायास ही ''वाह'' निकल जाता है.बहुत सुंदर.
.अपने खामोश क़दमों से
वक्त की रेत पर अपने निशाँ
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
abhivakti..bhav ne dil pe halki si dashtak dedi....beautiful....
Ranju ji, bhut sundar rachana. badhai ho. likhti rhe.
bahut hi sundar rachana....
aapko pehli baar padha..padhte hi kayal ho gaye aapki lekhni ke..
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
itni sundar rahchana..baantne ke liye shukriya..
यूं छोड़ के चली जाती है
जैसे हाथों के पोरों से ...
भीनी सी रात की बेला ,
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है.....
रंजना जी ! पढ़कर ही मुंह से निकल जाता है बहुत खूब सुरत, आपकी रचना बहुत सुन्दर है !
इस मनोहर रचना का शुक्रिया .........
मुझ जैसे नीरस आदमी को भी ये लाइने पसंद आ जाती हैं... इधर आप लिख देती हैं उधर अनुरागजी... यूँ ही लिखती रहे लगता है एक दिन मुझे भी शायर बना देंगे आप दोनों !
very nice ranjana ji. superb...
हथेली पर रखे ,चाँद के टुकड़े को
लबों के कोरों से छू के चली जाती है !!
bahut hi sunder panktiya.
badhiya
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